
जिसने खुद भूखे रहकर हमें खिलाया है,
आंसुओं को छुपाकर हंसना सिखाया है।
रातों की नींदें जिसने हमारी खातिर खोईं
दर्द छुपाकर जिसने हर खुशी हमें बोई।
हम गिरते रहे, वो संभालती रही,
हर ठोकर पर हमें दुलारती रही।
खुद की ख्वाहिशें उसने कहीं दफना दीं,
हमारी राहों में खुशियों की लौ जला दी।
जब दुनिया ने ठुकराया, मां ने गले लगाया,
हर टूटे दिल को उसने ही सहलाया।
उसके आंचल में सारा जहां मिलता है,
उसकी दुआओं से ही मुकाम मिलता है।
वो थकती नहीं, बस चलती ही जाती है,
हर दर्द को हंसकर सहती ही जाती है।
उसकी ममता सागर से भी गहरी होती है,
उसकी छाया हर दुख पे पहरी होती है।
मां के कदमों में जन्नत का अहसास है,
उसकी हर बात में सच्चा विश्वास है।
सच में, मां की महिमा कोई समझ नहीं पाएगा,
मां के दूध की कीमत कोई नहीं चुका पाएगा।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश



