साहित्य

मेरी माँ

संजय कुमार

जब तू मेरी उंगली कस कर पकड़ती है,
जब तू सारी दुनियां मुझको दिखलाती है,
मैं जब रोता हूं,दिखा खिलौना हँसाती हैं,
मैं चांद मांगता हूं तो उसको मामा बतलाती है।

मैं सोता हूं गोद में,तू परीलोक की सैर कराती है,
मैं दौड़ कर गिरता हूं,मुझें तू घबरा कर उठाती है,
मैं खो ना जाऊं भीड़ में,भाई का हाथ पकड़ाती है,
मैं बहन से लड़ता,तू साथ रहने का पाठ पढ़ाती है।

जब मैं अकेला होता हूं,सच में बहुत घबराता हूं,
तेरे पैरों की आहट सुनकर,साहसी बन जाता हूं,
रूठ जाता हूं तुझसे,जाने कितने बहानो से मनाती है,
तू छुप जाये कही मुझें से,तो मैं फूट-फूट कर रोता हूं।

मुझे लाड प्यार से तैयार करके स्कूल छोड़ आती है,
छुट्टी पर स्कूल के बाहर खड़ी, मुस्कराती नजर आती है,
खोल टिफिन मेरा बचा,खाना घर पर मुझे खिलाती है,
बार-बार मेरा लाडला कहकर होमवर्क पूरा कराती है।

माँ मैं बड़ा हो गया हुँ अपने पैरों पर खड़ा हो गया हुँ,
आज जिम्मेदारी निभाते निभाते भीड़ में खो गया हुँ,
आज माँ मैं रोता हुँ अकेले में पर आंसू नहीं निकलते हैं,
आज माँ तेरी ऊँगली पकड़ कर, फिर बचपन में खो गया हुँ,
………..संजय कुमार…….
………….आगरा……….

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