
महिला दिवस के दिन एक बगीचे मे भीड़ इकट्ठा होने लगी। देखते ही देखते महिलाओं की विशाल भीड़ जमा हो गयी। पुरुषों में ऐसी भीड़ देखकर घबराहट होने लगी। ह्रदय की धड़कनों की तीव्रता बढ़ गयी। चेहरे पर घोर निराशा दौड़ गयी। किसी अनहोनी की आशंका सताने लगी।
कुछ पुरुष खिड़की से झांक रहे हैं। कुछ फोन पर बतिया रहे हैं। कुछ ने इधर-उधर से जासूसी की लेकिन थाह नहीं चला कि इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं का झुंड क्यों है? पुरुष समाज को संकट में डाल दिया। कुछ चालाक टाइप के पुरुषों ने महिलाओं का वस्त्र पहन महिलाओं के सम्मेलन में घुस गये।
महिलाओं का महासम्मेलन शुरू हो गया। देश के कोने-कोने से महिलाओं ने शिरकत की। इस सम्मेलन को संबोधित करते हुए महिलाओं की अध्यक्षा ने अपना विचार व्यक्त किया। पुरुष न होते तो महिला महासम्मेलन की कोई आवश्यकता नहीं महसूस होती।
पुरुषों ने महिलाओं पर घोर अत्याचार किये हैं। घर के कोने- कोने तक काम कराया है। चूल्हे-चौके तक की सारी जिम्मेदारी दी है। खाने में नमक तेज हो जाये तो पुरुषों ने पूरी थाली फेंक दिए हैं। हम महिलायें पुरुषों का जूठन खाती हैं।
अब समय आ गया है कि महिलाओं को किचेन में नहीं रहना है। गृहमंत्री पद से इस्तीफा देना होगा। पुरुष अपना चूल्हा-चौका सम्हाले। सीधा प्रसारण हो रहा था।
महिलाओं के हुंकार से पुरुष डरे नजर आ रहे थे। पुरुषों ने इसे दुखद बताया। एक महाशय ने जहर खा कर आत्महत्या कर ली। घोर कलयुग आने की संभावना ज्योतिषियों ने ऐलान कर दी।
इसी वजह से पुरुष महिला सशक्तिकरण के पक्ष में खुलकर नहीं रहते हैं। उन्हें डर है कि महिलाओं में पुरुष वाला भाव आया तो पुरुषों को गृहमंत्री का पद मिल सकता है।
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जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज




