
है अबूझ एक पहेली सी, सौम्य रमणीय नारी।
छली गई जिस भी युग प्यारी, पड़ी सदा ही भारी।।
है भविष्य जननी के हाथों , पग है छांँव घनेरा ।
संग -संग ज्यों चले संगिनी, स्वर्णिम लगे सवेरा।
प्रबल साहसिक चट्टानों सी, नही समय से हारी ।
है अबूझ एक पहेली सी , सौम्य रमणीय नारी।।
बिन पर के नभ में उड़ने की, जागी है अभिलाषा ।
जैसे-जैसे यह युग बदला, गढ़ी नई परिभाषा।
परचम चहुँ दिशि में फहराती ,हर बाजी है मारी।
है अबूझ एक पहेली सी, सौम्य रमणीय नारी।।
आंँचल में है लाज समेटे, दृग में प्रेम छुपाए।
स्पर्श पतित माधुर्य चंदन सा , हृदय ओज भर जाए।
रक्त श्वेद से निश्छल सिंचे, जीवन बगिया क्यारी।
है अबूझ एक पहेली सी, सौम्य रमणीय नारी।।
किरण कुमारी ‘वर्तनी’ जमशेदपुर




