साहित्य

नया सवेरा

अतुल पाठक

जब अंधेरों से घिर जाए जीवन की हर राह,
जब थक कर बैठ जाए मन, टूटने लगे हर चाह,
तब याद रखना — हर रात की गोद में
एक उजला सवेरा पलता है।

ठोकरें ही रास्तों का मान बढ़ाती हैं,
हारें ही जीत की कीमत बताती हैं।
जो गिरकर फिर खड़ा हो जाता है,
वही इतिहास में अपना नाम लिखाता है।
मत डर तू कठिनाई की आंधियों से,
ये तो तेरी हिम्मत को आज़माने आती हैं।
जो दीपक तूफानों में भी जलते रहते हैं,
वही दुनिया को रोशनी दिखाते हैं।
चलते रहना बस अपने विश्वास के साथ,
भले ही राहें काँटों से भरी क्यों न हों।
क्योंकि मंज़िल उन्हीं को मिलती है,
जो हारकर भी हार नहीं मानते।

 

हौसलों का दीप
जब मन में हौसलों का दीप जलता है,
तो हर अंधेरा छोटा लगता है।
जो खुद पर विश्वास रखता है,
उसका हर सपना सच्चा लगता है।
तूफान भी रास्ता बदल लेते हैं,
जब साहस की दीवार खड़ी होती है।
जो अपने इरादों पर अटल रहता है,
उसकी जीत ही बड़ी होती है।
मत डर तू इस दुनिया की बातों से,
अपने मन की आवाज़ सुन।
तेरे अंदर जो शक्ति छिपी है,
उसे पहचान और आगे बढ़।
याद रख —
हिम्मत और विश्वास का संगम ही
मनुष्य को महान बनाता है।

ओ मुस्कान
तेरी मुस्कान जब चेहरे पर खिल जाती है,
जैसे चाँदनी रात अचानक जगमगा जाती है।
तेरी आँखों में जो हल्की सी चमक है,
वो मेरे दिल की धड़कन बढ़ा जाती है।
तेरी बातों में एक अजीब सी मिठास है,
जैसे फूलों में बसी कोई खास खुशबू हो।
जब भी तू पास से गुजरता है,
लगता है जैसे हवा में भी कोई जादू हो।
कभी तेरी यादों में खो जाता हूँ,
कभी तेरी बातों में मुस्कुरा जाता हूँ।
पता ही नहीं चलता कब तेरी चाहत में
मैं खुद को भी भूल जाता हूँ।
अगर तू साथ हो तो हर पल त्योहार लगे,
हर राह मुझे गुलज़ार लगे।
तेरी मुस्कान ही मेरी दुनिया है,
तेरे बिना सब कुछ बेकार लगे।

युद्ध के विरुद्ध मानवता (ओजपूर्ण कविता)
जब-जब धरती पर युद्ध की ज्वाला धधकती है,
मानवता की सांसें भी सहम-सहम कर चलती हैं।
सीमाओं की जिद में जलते हैं घर और आंगन,
मासूम आंखों की नींद अचानक ही पलती है।
बारूद की गंध से भर जाता है सारा गगन,
नदियों का जल भी जैसे आंसू बनकर बहता है।
विजय के नारे चाहे कितने ऊँचे क्यों न हों,
हर शोर के पीछे एक घर चुपचाप सिसकता है।
किसी मां का बेटा रणभूमि में गिर जाता है,
किसी बहन की राखी सूनी रह जाती है।
किसी पत्नी की मांग का सिन्दूर उजड़ जाता,
किसी बच्चे की हंसी भी चुप हो जाती है।
सोचो ज़रा, यह कैसी जीत का उत्सव होगा,
जब इंसानियत ही हार के आंसू रोती है।
इतिहास भी ऐसे क्षणों में मौन खड़ा रहता,
जब सत्ता की चाह में मानवता खोती है।
आओ मिलकर यह प्रण आज फिर से दोहराएं,
नफरत की हर दीवार को मिलकर गिराएंगे।
प्रेम और करुणा के दीप जलाकर जग में,
शांति का सुंदर सवेरा फिर से लाएंगे।
धरती की यही पुकार है हर एक मानव से,
युद्ध नहीं, अब शांति का ही मार्ग चुनो।
हाथों में हथियार नहीं, विश्वास सजाओ,
और मानवता के भविष्य को सुरक्षित बुनो।

अतुल पाठक
हाथरस(उत्तर प्रदेश)

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