साहित्य

पूर्णिका

मंजुला शरण "मनु"

दिल की उन यादों को सबसे मैं छुपाऊँ कैसे
मानता अब दिल नहीं तो मैं मनाऊँ कैसे ।। नेह 1

भोर के सपने में आना फिर से मीत का
स्वप्न के उन मधुर पल को मैं भुलाऊँ कैसे ।। नेह 2

सच हुआ करते हैं सच में सपने भोर के
मन के इस विश्वास को मैं छुपाऊँ कैसे। ।नेह 3

लौट आया बसंत फिर से जैसे ग्रीष्म में
कौन से फूलों से अब घर मैं सजाऊँ कैसे ।। नेह 4

धड़कनों की गूँज फिर शहनाई बनी है
यह अनाहत का संगीत मैं सुनाऊँ कैसे।। नेह 5

एक तेरी ही छवि याम के आठो प्रहर में
हो गयी यह चातकी मयूरी मैं बताऊँ कैसे।।-नेह 6

परिचयी नेह *–*
मन का विहग जब उड़ चला आकाश में
मेघ का काजल ‘मनु’ मैं लगाऊँ कैसे ।। नेह 7

मंजुला शरण “मनु”
राँची, झारखण्ड़।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!