
दिल की उन यादों को सबसे मैं छुपाऊँ कैसे
मानता अब दिल नहीं तो मैं मनाऊँ कैसे ।। नेह 1
भोर के सपने में आना फिर से मीत का
स्वप्न के उन मधुर पल को मैं भुलाऊँ कैसे ।। नेह 2
सच हुआ करते हैं सच में सपने भोर के
मन के इस विश्वास को मैं छुपाऊँ कैसे। ।नेह 3
लौट आया बसंत फिर से जैसे ग्रीष्म में
कौन से फूलों से अब घर मैं सजाऊँ कैसे ।। नेह 4
धड़कनों की गूँज फिर शहनाई बनी है
यह अनाहत का संगीत मैं सुनाऊँ कैसे।। नेह 5
एक तेरी ही छवि याम के आठो प्रहर में
हो गयी यह चातकी मयूरी मैं बताऊँ कैसे।।-नेह 6
परिचयी नेह *–*
मन का विहग जब उड़ चला आकाश में
मेघ का काजल ‘मनु’ मैं लगाऊँ कैसे ।। नेह 7
मंजुला शरण “मनु”
राँची, झारखण्ड़।




