
सागर की गाहराई जैसा अपनी प्रीत की है गहराई
मेरी रूह तेरे दिल में है जैसे सीप में मोती है समाई
फूलों की खुशबू से जैसी फिजां में महक है महकाई
मेरे मन की बगिया में जैसे बह रही है हवा पुरवाई
ये बदरा काली काली अंबर में क्यूँ आज है छाई
क्या मेरी मेहब्बत की दे रही है आकर हमें दुहाई
ये झिंगुर कहीं छिपकर बजा रही है प्रेम की शाहनई
क्या मोहब्बत की सनम हो रही है इश्क से सगाई
हँसी खुशी की ये जीवन मैने तेरी काली जुल्फों में पाई
जैसे सावन की फुहार से सुखा धरा ने प्यास है बुझाई
जैसे बिन पानी मीन को नदिया नई जीवन है दिलाई
जैसे महुवा की फूलों से जंगल में मद की नशा है पाई
अपनी प्रेम की चर्चा से जग आज है बहुत गरमाई
क्योंकि अपनी प्रेम में हमदम है प्रेम की एक सच्चाई
अपनी प्रेम की कहानी हर युवा दिल को है धड़काई
जैसे सूनी तलाब में कंकड़। गिरने पे तरंग है फैलाई
अपनी प्रीत की ये नई शहर लगता है रब ने है बनाई
जर्रा जर्रा पे सनम प्यार की फूल है उग आई
अपनी प्रेम की जानम जान। चुका ये जग गहराई
वो देखो गुलशन की सब कलियां स्वागत में है आई
उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार



