साहित्य

साहित्य की असल ख़ूबसूरती उसकी सच्चाई में है

डॉ. मुश्ताक अहमद शाह

साहित्य का असली मक़सद तो समाज की सच्चाई को उजागर करना, लोगों के जज़्बात और दर्द को आवाज़ देना था। लेकिन आजकल बहुत से लेखक सिर्फ़ वाहवाही या छपने की होड़ में अपने क़लम को झूठी तारीफ़ों और सतही बातों तक सीमित कर रहे हैं।
आजकल क़लम में वो हकीक़त की तल्ख़ी, वो सच्चाई कम होती जा रही है।
अकसर लिखा जाता है सिर्फ़ छपने के लिए,
जैसे ज़मीर को ताले में बंद कर दिया गया हो।
क़लम अब वो आईना नहीं रही
जो समाज की असल सूरत दिखाती थी।
शायद हम डर गए हैं—
सच लिखने से,
लोगों की नाराज़गी से,
या फिर अपने ही ज़मीर की आवाज़ से।
आज के दौर में
क़लम अक्सर ठकुरसुहाती बातें लिखती है,
ताकि तालियाँ बजें,
छपाई हो,नाम मिले।
लेकिन याद रखिए—
साहित्य की असल ख़ूबसूरती
उसकी सच्चाई में है,
उस ज़मीर की आवाज़ में है
जो बेबाक़ होकर,
बिना किसी डर के
हक़ और सच को बयान करता है।
हमें फ़िर से अपने अंदर के उस लेखक को जगाना होगा
जो सिर्फ़ वाहवाही के लिए नहीं,
बल्कि समाज की आँखों में आँखें डालकर
सच बोलने की हिम्मत रखता है।
आइए, क़लम को फ़िर से ज़िंदा करें—
ज़मीर की आवाज़ बनकर,
सच की रोशनी बनकर।

डॉ. मुश्ताक अहमद शाह
सहज़ हरदा मध्य प्रदेश

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