
जब मौन हृदय की पीड़ा बोले,
तब कविता आकार लेती है।
सूनी आँखों की हर बूंद में,
एक नई धार बहती है।
जब अन्यायों की धूप तपे,
और सत्य कहीं छिप जाए,
तब शब्दों का दीप जलाकर,
कविता ही राह दिखाए।
जब मन में प्रेम उमड़ता हो,
और भाव न रुकने पाते हों,
तब छंदों की कोमल लय में,
सब बंधन टूट जाते हों।
कविता केवल अलंकार नहीं,
यह जीवन की अनुभूति है,
हर पीड़ा, हर एक हर्ष की,
सजीव, सशक्त अभिव्यक्ति है।
यह खेतों की हरियाली है,
यह नभ में उड़ते पंछी हैं,
यह माँ की ममता का आँचल,
और संतों की वाणी सच्ची है।
जब-जब मानव थक जाएगा,
और आशा भी सो जाएगी,
तब कविता की मधुर किरण,
फिर से दीप जलाएगी।
आओ इस दिवस पर हम,
शब्दों का मान बढ़ाएँ,
मानवता के हर कोने में,
कविता का दीप जलाएँ।
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




