साहित्य

समाज सेवा का फल–हास्य-व्यंग्य

जयचन्द प्रजापति 'जय'

मुर्गा सोते लोगों को जगाता है। जब सब गहन निद्रा में सोने का प्रयास करते हैं। वह बेचारा अपनी नींद खराब कर समाज सेवा का कार्य करता है। पूरी ताकत लगाता है बोलने में ताकि पढने वाले छात्र भोर में उठकर ज्ञानार्जन कर सके।

किसान अपने समस्त काम घर का निपटा कर खेतों में जाकर खेती कर सके। सबेरा होने का एहसास कराता है। मुर्गा समाज सेवा बड़े चाव से करता हैं। सबको अपने समय पर लोगों को काम पर भेजता है।

मुर्गे के इस कार्य से लोगों ने जी भर सराहना की। लोगों ने दाने खिलाये। पानी पिलाया। तारीफों के पूल बांधे गये। मुर्गा अपनी सराहना पर अतीव प्रसन्न हुआ।

धीरे-धीरे समय के साथ मुर्गे की शक्ति क्षीण होने लगी। बेचारा किसी दिन नींद आ जाती। समय पर बोल नहीं पाता। लोग मुर्गे को गाली देने लगे‌। मुर्गा बेचारा बहुत असहज महसूस किया। मुर्गे ने कहा–जब हम समय पर बोलते तो लोग दाना खिलाते। अब समय मेरा साथ नहीं दे रहा है तो लोग गालियाँ बक रहे हैं।

एक दिन मुर्गे को सर्दी जुखाम हो गया। बेचारा बोलने का बहुत प्रयास किया लेकिन बोल नही पाया। लोगों को गुस्सा आ गया और मुर्गे को मार डाला और सब लोगों ने मिलकर मुर्गे की मांस को खा गये। मुर्गे को समाज सेवा का फल मिल गया। अंततः मुर्गे को जान से हाथ धोना पड़ा।

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जयचन्द प्रजापति ‘जय’

प्रयागराज

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