
जाड़ों का जब कोप दूर हो,
तब हम हर्ष मनाते हैं
अम्बे मां का जब हो आगमन
तब नव वर्ष मनाते हैं
धरती के उर से उपजी है
सरसों की यह हरियाली,
रंग-बिरंगे फूलों से लद गयी
बाग की हर डाली
भ्रमर मधुर गुंजार लगाए,
तब हम हर्ष मनाते हैं
अंबे माँ……..
गेहूँ की ये कनक बालियाँ
हवा संग लहराती हैं,
आमों के नवपल्लव में छिप
कोयल गीत सुनाती है
बौरों से लद जाएंँ डालियांँ,
तब हम हर्ष मनाते हैं
अंबे माँ…….
आओ मिलकर द्वार सजाएँ
तोरण वहाँ लगाएँ,
हर घर रंगोली से सजाएँ
छत पर ध्वज फहराएँ
दीप जलायें माँ के सम्मुख,
तब हम हर्ष मनाते हैं
अंबे माँ………
नवरात्रों में जगदंबे माँ
जब धरती पर आती हैं,
जैसी जिसकी निष्ठा होती
वैसा फल दे जाती हैं
हवनगंध जब चहुंँदिशि फैले,
तब हम हर्ष मनाते हैं
अंबे माँ ………..
आशा बिसारिया चंदौसी उ.प्र.



