साहित्य

बाल हनुमान

जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी "जीत"

मधुर मुस्कान बिखेरे, चंचल नयन ज्यों मोती,
गोधूलि की लालिमा में, दमकता लालन योति।

सूरज के संग झिलमिल, तन पर सुनहरी रश्मि,
पंखुड़ी जैसी कोमलता, मनमोहक मृदुल सम्राट।

शिशु की चंचल हँसी, बिखेरे मंगल गान,
मृदु स्पर्श उसके चरणों का, हर हृदय करे प्रणाम।

सुनहरी लट्टियाँ उड़ें, ज्यों वायु संग नाचती,
माला मोती की बनी, अंगुलियों में झिलमिलाती।

कौंच की कलियाँ हों, या कमल के पंखुड़ी समान,
बाल रूप हनुमान जी का, भाव जगाए हृदय महान।

नन्हे हाथ में गदा, चमकती शक्ति का प्रतीक,
हर्षित चित्त उसकी लीला, नन्हे प्रह्लाद समान।

धैर्य, वीरता और भक्ति का, प्रतीक अद्भुत दयान,
सुगंधित केसरी पुष्प जैसे, शिशु तन महकाए।

मधुर बाण उसका नन्हा, दुष्ट पर भय लुटाए,
नयन उसकी गगन जैसे, निर्मल, विशाल, निर्मोही।

बाल रूप में छुपा वेदांत, शुद्ध और अटल सोही,
शिशु हनुमान का रूप, प्रेम, भक्ति और आनंद भरे।

सर्वत्र उसके गुण झलके, चंचलता में सहज प्रकट,
हर कण में बसता सजीव, मोक्ष और शक्ति के धारे।

सूर्य और चंद्रमा भी, झुकें उसके रूप के आगे,
वन-वन में गूंजे मंत्र, उसके बाल रूप के साजे।

हर मुस्कान में विराजे, स्नेह, करुणा और उजियारा,
बाल हनुमान का रूप, मन को करे हर्षित सारा।

~ जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी “जीत”,
युवा लेखक,कवि एवं साहित्यकार
सक्ती, छत्तीसगढ़

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