साहित्य

ग़ज़ल

पंडित मुल्क राज "आकाश"

जो सुबह को कहते शाम तो हम शाम मान लेते।
फ़कत एक इशारे पर हम दिलों जान लुटा देते |

न ताबीर की हसरत थी, न मंजिल की तमन्ना थी,
तुम्हारे एक सजदे में हम, खुद को भुला देते।

अगर सुबह को तुम कहते, कि ये शाम ए-गरीबा है,
तो हम भी मान लेते बस, यही फैसला सुना देते।

तुम्हारी लव-कुशवाई ही हमारी जीत होती फिर,
तुम्हारे हुक्म पर मर जाते इक जन्नत सजा देते।

न कोई उज़्र होता न कोई इल्तज़ा होती,
तुम्हारी हर ज़फ़ा में भी वफ़ा की इब्दजा देते।

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पंडित मुल्क राज “आकाश”

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