
मन्द ताप रवि का होते ही,शीत पड़े विकराल।
घूम रहे नर नारी देखो, कांधे ओढ़े शॉल।
दिनकर खेले आंख मिचौली,त्याग तपिश की आग।
पवन ठिठुरके थिरका करती,शिथिल पड़े सब बाग।
दीन- हीन सड़कों पर सोएँ, काटे समय निढ़ाल।
घूम रहे नर नारी देखो, कांधे ओढ़े शॉल।
सर्दी ने दे दी अब दस्तक,छाई है अब धुंध।
पशु पक्षी सब लगे काँपने,सुन्न वृक्ष की गंध।
छाई राहों में खामोशी, ठहर गई जन चाल।
घूम रहे नर नारी देखो, कांधे ओढ़े शॉल।
अंगारों की गर्माहट को,तरस रहे हैं हाथ।
सर्दी में है सांसे ठिठकी,उगो उगो प्रभुनाथ।
लंबी रातों में सर्दी की, तारे करें कमाल।
घूम रहे नर नारी देखो, कांधे ओढ़े शॉल।
ओस पनाहें मांगे देखो, तरुवर तृण पर बैठ।
उड़कर ओझल हो जाती है,जब दिनकर की पैठ।
नव प्रभात अब आन उबारो,रो -रो कहते बाल।
घूम रहे नर नारी देखो, काँधे ओढ़े शॉल।
शीत ऋतु के बाद बसंती,आती चीख पुकार।
आना जाना लगा रहे नित,यह जीवन आधार।
टोपी मफलर कोट पहनते,नर नारी अरु बाल।
घूम रहे नर नारी देखो, कांधे ओढ़े शॉल।



