
ग्रेजुएशन का तीसरा साल और भविष्य की धुंधली तस्वीरें। किरण के लिए यह साल केवल डिग्री का नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई का था। दसवीं के बाद से ही उसने अपनी आँखों में सफलता के जो ख्वाब पाल रखे थे, तीन साल की कड़ी तपस्या के बाद भी वे हकीकत की जमीन पर नहीं उतर सके। असफलता का स्वाद कड़वा था, और उससे भी कड़वी थी समाज और घर की बातें।
माता-पिता का सब्र अब जवाब दे रहा था। “पढ़ाई में पैसा पानी की तरह बह रहा है, पर नतीजा कुछ नहीं। अब और कितने दिन हौसला पकड़े रखोगी? अब कोई और रास्ता देखो,”—पिता के ये शब्द रीता के कानों में अक्सर गूँजते। भारी मन से उसने अपनी राह मोड़ी और खुद को घर की चारदीवारी में समेट लिया।
तभी उसकी जिंदगी में उम्मीद की एक किरण जागी। एक पुराने परिचित के जरिए उसे घर बैठे काम (Work from Home) का अवसर मिला। उस शख्स ने बड़े भाई की तरह मार्गदर्शन किया, काम समझाया और किरण का आत्मविश्वास लौटाया। किरण को लगा कि अब वह पढ़ाई भी करेगी और घर की आर्थिक स्थिति में हाथ भी बँटाएगी।
महीने के अंत में जब उसके मोबाइल पर “Account Credited: ₹10,000” का मैसेज आया, तो उसकी आँखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। वह उसकी पहली कमाई थी—उसकी मेहनत, उसकी रातों की जागृति का फल। उसने गर्व से अपनी माँ और भाई को बताया। उसने सोचा था कि इन पैसों से वह अपने अगले साल के एडमिशन की फीस भरेगी और पिता के कंधों का बोझ थोड़ा हल्का करेगी।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
दो दिन बाद ही उस ‘सहयोगी’ का फोन आया। स्वर में बड़ी बेचैनी और मजबूरी थी— “मेरी मदद करो, मुझे पैसों की सख्त जरूरत है। बस दो-चार दिन की बात है, मैं तुरंत लौटा दूँगा।”
किरण दुविधा में थी। माँ ने अनुभवी स्वर में आगाह किया, “बेटा, दुनिया उतनी सीधी नहीं है जितनी दिखती है। अपनी पहली कमाई को इस तरह मत दो।”
पर किरण के मन पर उस व्यक्ति के उपकार का बोझ था। उसने सोचा, “अगर इन्होंने रास्ता न दिखाया होता, तो ये पैसे ही न होते। मुसीबत में साथ छोड़ना तो कृतघ्नता होगी।” उसने अपने एडमिशन की बात दोहराते हुए उसे पैसे भेज दिए। उधर से आश्वासन मिला— “भरोसा रखो, मैं जल्द लौटा दूँगा।”
फिर वक्त का पहिया घूमा।
तीन दिन हफ्ते में बदले, हफ्ते महीनों में, और देखते-देखते छह महीने बीत गए। वह शख्स जिसने मदद का मुखौटा पहन रखा था, अब फोन नहीं उठाता था। अंत में उसने किरण का नंबर ही ब्लॉक कर दिया।
किरण की पहली कमाई, उसकी मासूमियत और उसका भरोसा—तीनों ही उस ‘कर्ज़’ की भेंट चढ़ गए जो उसने कभी लिया ही नहीं था।
कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)
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