उत्तराखंड उच्च न्यायालय का कड़ा रुख तेजबल सिंह व रवि सनवाल को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के निर्देश, आय से अधिक संपत्ति व अनियमितताओं के आरोपों पर सुनवाई तेज
हरिद्वार। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने तत्कालीन जिलापूर्ति अधिकारी हरिद्वार तेजबल सिंह और क्षेत्रीय खाद्य अधिकारी बहादराबाद रवि सनवाल के खिलाफ दायर याचिका को गंभीरता से लेते हुए दोनों अधिकारियों को न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश जारी किए हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि संबंधित प्रकरण में सभी आवश्यक अभिलेख प्रस्तुत किए जाएं और मामले की तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट की जाए।

ऑल इंडिया फेयर प्राइस शॉप डीलर्स फेडरेशन, उत्तराखंड द्वारा जारी प्रेस नोट के अनुसार दोनों अधिकारियों पर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने, वित्तीय अनियमितताओं, प्रशासनिक प्रक्रियाओं में कथित गड़बड़ियों तथा पद के दुरुपयोग के आरोप लगाए गए हैं। संगठन का कहना है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली से जुड़े कई मामलों में शिकायतें लंबे समय से लंबित थीं, जिन पर कार्रवाई न होने के कारण न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा।


फेडरेशन के पदाधिकारियों — प्रदीप अग्रवाल (महामंत्री), और नरेंद्र शर्मा (जिला अध्यक्ष) ने आरोप लगाया कि संबंधित अधिकारियों के कार्यकाल में राशन व्यवस्था से जुड़े निर्णयों में पारदर्शिता की कमी रही और कई स्तरों पर अनियमितताओं की शिकायतें सामने आईं। उन्होंने कहा कि उपभोक्ताओं तथा उचित दर विक्रेताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए निष्पक्ष जांच अत्यंत आवश्यक है।
प्रेस नोट में उल्लेख है कि न्यायालय ने पूर्व में भी प्रकरण से संबंधित रिकॉर्ड प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे, लेकिन संतोषजनक जवाब न मिलने पर न्यायालय ने सख्त रुख अपनाया। अब दोनों अधिकारियों को अगली निर्धारित तिथि पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर जवाब देने और संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा गया है।
फेडरेशन का यह भी कहना है कि कथित अनियमितताओं के कारण सार्वजनिक वितरण प्रणाली की विश्वसनीयता प्रभावित हुई है और आम उपभोक्ताओं को परेशानी का सामना करना पड़ा। संगठन ने मांग की है कि मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए, ताकि व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
प्रकरण को लेकर प्रशासनिक और आपूर्ति विभाग के हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायालय की सख्ती से मामले की सुनवाई में तेजी आएगी और तथ्यों की स्पष्टता सामने आएगी। अब सभी पक्षों की नजरें आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां प्रस्तुत अभिलेखों और पक्षों की दलीलों के आधार पर आगे की दिशा तय होगी।




