
सुख,इंद्रधनुष-सा क्षणिक है,
जैसे नभ में आती जाती छाया,
शांति,धरा की गोद में पले,
जिसने मन में घर बनाया।
सुख, बाहरी उजालों में है,
तालियों की गड़गड़ाहट में है
शांति,अंतस् में दीप जला दे,
संतोष उसका मधुर उपहार है।
सुख,है जैसे तरंगें सागर की,
उठती-गिरती हैं बार-बार,
शांति,है उसकी गहराई,
जहाँ बसता है प्यारा संसार।
सुख,मौसम-सा बदल जाता,
जैसे धूप-छाँव का फेरा ,
शांति, समय की साक्षी है,
स्थिरता है उसका सवेरा।
सुख, इच्छाओं की धूप सा,
तपता मन उसकी प्यास,
शांति,तृप्ति की छाया बन,
शांत कर दे मन की आस।
सुख, है लोगों की दृष्टि में,
मात्र प्रशंसाओं का हार,
शांति,आत्मा की आँखों में,
जैसे सत्य की चमकार।
सुख, के जाने से टूटे मन,
उठते हैं संशय और राग,
शांति, रहे तो विरह भी
बन जाए साधना और त्याग।
सुख,जीवन को रंग दे देता,
पर ये रंग जल्दी उतर जाए,
शांति, हो तो फीके रंग में भी
ज़िंदगी का अर्थ समझ आ जाए।
सुख, क्षण का अतिथि बनकर,
द्वार से ही वापस लौट जाए,
शांति, नित्य निवास करे,
गर दिल में सुकून बस जाए।
लेकिन
सुख, बिना शांति भ्रम सी है ,
मृग-मरीचिका के समान,
शांति,संग जो सुख मिलता,
वही सच्चा विश्राम धाम।
सुमन बिष्ट, नोएडा



