
आये सखी दिन फागुन के
फाग गवें हैं द्वारे- द्वारे
ढोल बजे और बजे नगाड़े
आये सखी दिन फागुन के।
फूली सरसों नहीं समाती
कली मटर की है सकुचाती
गेहूॅं बाली तो इठलाये
आये सखी दिन फागुन के।
शोर हुआ फूलों का दूना
तितली भमरों का क्या कहना
गूंज उठी कोयल की तानें
आये सखी दिन फागुन के।
सतरंगी रंगों की डोली
लेकर आई होली द्वारे
हवा बसंती झूमे गायें
आये सखी दिन फागुन के।
डॉ.उमा रानी दुबे
जयपुर, राजस्थान




