
अलसाई गुनगुनी धूप में बैठते ही
भूली बिसरी यादों की तस्वीरें
दिल पर बार बार दस्तक दे
मन को टटोलने लगती है।
कुछ खट्टी, कुछ मीठी यादें
सुंदर तानो-बानो में सजी
दिलों में दबे एहसासों को सहलाती
जाने अनजाने बेवजह चली आती हैं।
गुनगुनी धूप में अलसाई इन्द्रियाँ
अनजाने के सफ़र पर निकल
भूत, भविष्य और वर्तमान के
अनछुए क़िस्से सुनाने लगती है।
गुनगुनी धूप में बैठ बुने
स्नेह धागों के ताने-बानो संग
दिल्लगी, चुहलबाजी, हँसी ठिठोलियाँ
अपनत्व का राग गुनगुनाने लगती है।
शीतल हवाओं की मन्द मन्द छुअन
लहलहाते फूलों की महक
गुनगुनी धूप की गर्माहट सुकून का एहसास दिलाने लगती है।
स्वरचित मौलिक रचना
सुमन बिष्ट




