साहित्य

लघु कथा आदमी और कुत्ता

डॉ रामशंकर चंचल

मेरे घी के नीचे वाले में मेरे ए टी म मशीन थी हटा दी दुकान खाली थीं
कुछ दिन बाद एक कुत्ता अपने पूरे परिवार सहित वहां खाली जगह में रहने लगा, अच्छा लगा सोचा किसी को सुकून दे रही है पर, एक भय रोज़ बना रहता था , मेरी कालोनी शहर की सबसे व्यस्त हैं यहां पूरे दिन और रात बेहिसाब गाड़ियों को देखा जा सकता हूं और वह भी युवा पीढ़ी के,जवानों को अपना गाड़ी चलाने का अद्भुत हुनर लिए,3 ,4 को बैठा कर इतनी तेज़ आवाज करते हुए गाड़ी दौड़ता है कि, उन्हें देख मैं अक्सर ईश्वर से उसी समय
प्रार्थना करता हूं इन्हें सुरक्षित घपहुंचा देना और इससे ज्यादा मैं
फकीर कर भी क्या सकता

खैर साहब, वहीं हुआ जो डर था, आज एक मासूम कुत्ते का बच्चा गाड़ी में आया और वही ईश्वर को प्यारा हो गया , बस फिर क्या था
जिसने किया वह तो गायब ,अब बाकी सब गुजरती गाड़ियों पर, उसकी मां दौड़ती, भागती, चिल्लाती रही , पागलों की तरह
जिसे स्व दिलीप कुमार जी अपनी फिल्म मैं उनकी पत्नी वहीदा रहमान के लिए चीखते चलाते हैं
हर गाड़ी वाली के पीछे
खैर साहब, सुबह हरिजन बुला सब कुछ हटा दिया, दुकान बंद कर दी
अच्छा भी नहीं लग रहा था, पर सोचा कहीं और भीतर विराजमान हो यह अपनी बच्चों संग ताकि फिर कोई हादसा नहीं हो
पर नहीं साहब, प्रेम बहुत हो गया था उसे यहाँ की अद्भुत सुख सुकून और शांति से, अब बाहर लगी सीमेंट कुर्सी पर दस्तक दे रही थी
बच्चे दोनों नीचे रखीं मोटर सायकल के नीची आराम से सो रहे थे
मैं सालों से अपने किरदार निभाते हुए झाड़ू लगा रहा था , बच्चों को बहुत प्यारी मिट्टी नींद में देखे अजीब सुख सुकून मिल रहा था
मैने धीरे से उनके पास से गंदगी हटा
था उन्हें पता चला दोनों चुप चाप वहां से उठ कर जो साफ़ कर चुके वहां सो गए, मेरे चेहरे पर मुस्कान आईं अच्छा बहुत अच्छा लगा क्यों कि अक्सर लोग बैठे रहता है पर मुझे झाड़ू लगाते देख , अपना पैर नहीं हटाते हैं, कुछ देर के लिए भी
कोइ भी कभी उस सीमेंट कुर्सी से उठता तक नहीं, में कुछ नहीं बोलता
वो मुझे झाड़ू लगाने वाला समझ कर रहते हैं उन्हें नहीं पता में यहां का मालिक हूं , उनकी खुशी बरकरार रखती हूं और फिर कुछ बोला और वह कुछ ऐसा बोल गया जो मुझे पीड़ा दे
बेहतर है बैठने दे वैसे भी यह सब उन्हीं के लिए करता हूं ताकि उन्हें साफ़ जगह रोज़ नसीब हो कुर्सी लगाई है उन्हें के लिए
सोच रहा है झाड़ू लगा कर आया हूं अभी कितना फर्क है आदमी और
कुत्ते में , आदमी को यही अहम उसे
आज कुछ नहीं बना पाया, इसलिए आज दुनिया में सभी आदमी है
पर इंसान नहीं नज़र आता है जिसमे मानवीयता, संवेदनशील भावुकता हो और व्यक्ति के महत्व और अस्तित्व को समझे

खैर साहब लिखना था लोक दिया
अहम में जीती दुनियां को भला आज तक कोई नहीं समझा पाया
तो में भला कौन हूं, चौंकने वाले सत्य यह है कि उस समय बैठा हुआ
भी आदमी भी देखे रहा था,जो कभी, अपने पैर उठाता नहीं है और
मुझे धुर के देखा करता है, जैसे बोले रहा है , रुके जा अभी, मैं उठ जाऊं तब लगा लेना, जिसे वो ही है
अकेला, उसे नहीं पता तुम उठे तो तुम्हारा जैसा फिर कोई बैठ जायेगा

खर छोड़ो , जितना लिखा जाए कम है आज के आदमी पर जिसे कुत्ता
सिखा रहा था पर वह तब भी नहीं समझा

 

डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश
में सदा ही सत्य लिखता हूं
दिल और आत्मा को सुख सुकून दे बस रहता पा रहा हूं

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