साहित्य

संचार क्रांति का हिंदी साहित्य पर प्रभाव

डॉ ऋतु अग्रवाल

साहित्य एक ऐसी ललित कला है जो चिर अनादि काल से मानव की सहयोगिनी बनाकर उसके साथ रही है।किसी भी युग,काल,परिस्थिति,भौगोलिक स्थिति एवं अवस्था में साहित्य ने कभी भी मानव का साथ नहीं छोड़ा है। जिस प्रकार शारीरिक संतुष्टि के लिए मनुष्य भोजन एवं जल का सेवन करता है, ठीक उसी प्रकार मानसिक एवं आध्यात्मिक संतुष्टि के लिए वह साहित्य पान करता है।
शिलालेख,भोजपत्र,पांडुलिपियों,पुस्तकों से होते हुए आज साहित्यिक रचनाएँ मात्र एक उँगली को सिर्फ ऊपर-नीचे सरकाने के साथ ही दृष्टि के सम्मुख उपस्थित हो जाती हैं।आज से लगभग सौ वर्ष पहले साहित्य क्षुधा को शांत करने के लिए मानव पुस्तकों,समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं पर निर्भर था परंतु रेडियो एवं टेलीविजन के आविष्कार के पश्चात् साहित्य न केवल पठन-पाठन अपितु श्रवण एवं दर्शन का भी विषय हो गया है। पढ़ना,सुनना एवं देखना तीन ऐसी गतिविधियाँ हैं जिनके
परिणामस्वरुप साहित्य सामग्री मानसिक एवं बौद्धिक पटल पर सदैव के लिए अंकित हो जाती है।
विगत चार दशकों में कंप्यूटर के प्रयोग में साहित्य का मार्ग सभी सुधीजनों के लिए खोल दिया है। जहाँ पहले पुस्तक खरीदना,संग्रह करना एक जटिल एवं खर्चीला मार्ग था,वहीं कंप्यूटर एवं तत्पश्चात मोबाइल में साहित्य का पठन-पाठन अत्यंत सुगम कर दिया है। टेलीविजन,कंप्यूटर एवं मोबाइल संचार क्रांति के वे माध्यम है जिनके उपयोग से हिंदी साहित्य आज सिर्फ एक स्क्रीन दूर है।
प्रेमचंद,भारतेंदु हरिश्चंद्र,महादेवी वर्मा,सुभद्रा कुमारी चौहान जैसे छायावादी एवं मध्यकालीन साहित्यकारों के साथ-साथ जायसी,चंदरवरदाई,सूरदास,केशव,घनानंद,तुलसीदास जैसे आदिकालीन एवं भक्तिकालीन कवियों और आज
आधुनिककालीन साहित्यकारों जैसे अमृता प्रीतम, सआदत हसन मंटो,जॉन एलिया,अमीश त्रिपाठी और न जाने कितने ही साहित्यकारों को जब चाहे,जितना चाहे पढ़ा जा सकता है।उनकी रचनाओं एवं सर्जन शक्ति से स्वयं मार्गदर्शन प्राप्त किया जा सकता है,हिंदी भाषा का संपूर्ण शब्दकोश संचार के इन माध्यमों द्वारा सहज ही प्राप्य है।प्रत्येक शब्द के कितने ही अर्थ,पर्यायवाची एवं विलोम शब्दों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
परंतु जैसा कि विदित है कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं तो संचार क्रांति भी इससे अछूती नहीं है। संचार क्रांति ने हिंदी साहित्य एवं इसके मानक रूप को दुष्प्रभावित भी किया है।न जाने कितने ही साहित्यिक पटल, साहित्यिक गुरु एवं साहित्यकार आज हमें देखने को मिल जाते हैं जो साहित्य का आधारभूत स्तंभ अर्थात साहित्य की भावना को नहीं जानते।साहित्य का अर्थ है- स+हित अर्थात सभी का हित किंतु आज साहित्य के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है। ये तथाकथित साहित्यकार केवल और केवल इस संचार क्रांति के पादुर्भाव के कारण ही कुकुरमुत्तों की भाँति अपना अस्तित्व बनाए रखने में समर्थ सिद्ध हो पा रहे हैं। पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं को खरीदते एवं पढ़ते समय चयन का अधिकार पाठक के पास होता है परंतु संचार क्रांति के कारण वह छिछली, द्विअर्थी, अनर्गल शब्दों से परिपूर्ण भावरहित,बैसिर-पैर की रचनाएँ पढ़ने के लिए बाध्य हो जाता है। यद्यपि वह अतिशीघ्र ही उस रचना को अधूरा छोड़ आगे बढ़ जाता है किंतु तब तक उसके मानस पर कुछ न कुछ प्रभाव यह रचनाएँ अवश्य छोड़ देती हैं।
संचार क्रांति द्वारा यदि सबसे अधिक ह्रास किसी का हुआ है, तो वह हैं हमारे आज के युवा साहित्यकार।जिन्होंने पाठ्यक्रम में ही हिंदी भाषा को नहीं पढ़ा, भला वे हिंदी साहित्य के गंभीर एवं विचारपूर्ण साहित्य एवं साहित्यकारों को कैसे
जानेंगे (?)। उस पर तुर्रा यह कि उनके सामने संचार क्रांति का महादैत्य मोबाइल अपने अपरिमित ज्ञान के साथ मुँह फाड़े खड़ा है जो उनकी सृजनशीलता को न जाने कब और किस रूप में निगल जाएगा। जोड़-तोड़कर,कुछ चुराकर केवल लुभावने शब्दों एवं भावों द्वारा उत्तेजित करने वाली रचनाओं का सर्जन कर आज कुछ लोग स्वयं को श्रेष्ठ साहित्यकार के रूप में स्थापित करने की जुगाड़ में लगे हुए हैं और सोशल मीडिया पर उपस्थित उनके तथाकथित मित्र झूठी वाहवाही एवं प्रशंसा कर उनका बेड़ा गर्क तो कर ही रहे हैं साथ ही हिंदी साहित्य का गौरवमयी महल भी ढहाने पर उतारू हैं।
विभिन्न जागरूक साहित्यकार अभी भी हिंदी साहित्य की गरिमा एवं विकास के लिए प्रयासरत हैं एवं संचार माध्यमों का भी इस सुउद्देश्य के लिए प्रयोग करते हैं अत: यह अति आवश्यक है कि संचार क्रांति का प्रयोग हिंदी साहित्य के सुंदर विकास के लिए किया जाए न कि ओछी,छिछली मानसिकता के साथ हिंदी साहित्य को विकृत रूप में प्रस्तुत किया जाए और इसके लिए हम सबको प्रयासरत रहना होगा एवं अवांछित कृत्यों का विरोध करना होगा।

डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ,उत्तर प्रदेश

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