साहित्य

कहाँ मर गई थी मानवता

पूर्णिमा सुमन

तेरह बरस की नन्ही कली थी, आँखों में मुस्कान लिए,

उजले सपनों की गठरी लेकर, मन में क‌ई अरमान लिए।

 

राहों में कुछ भेड़िए बैठे, मानवता को भूल गए,

अपने भीतर के दानव को, खुलकर जैसे खोल गए।

 

जिसको उसको घर पहुँचना था, उसने ही व्यापार किया,

चंद रुपयों की ख़ातिर देखो, मानवता पर वार किया।

 

रोई बिटिया, चीखी बिटिया, गूँजी उसकी करुण पुकार,

लेकिन बहरे कान रहे सब, सोता रहा क्यों यह संसार?

 

धरती रोई, अम्बर रोया, रोया होगा हर इंसान,

कैसे इतने क्रूर हुए वे, जिनमें न बचा ज़रा ईमान।

 

उसने भी तो स्वप्न सजाए, पढ़-लिखकर कुछ बनने के,

माँ के आँचल में हँसने के, नभ में ऊँचा उड़ने के।

 

लेकिन नर-पिशाचों ने मिल, सारे सपने तोड़ दिए,

एक कली के कोमल जीवन पर, घोर अँधेरे छोड़ दिए।

 

क्रोध से मन भर जाता है, शब्दों में अंगार भरूँ,

ऐसे पापी जीवित क्यों हैं, प्राण छीन संहार करूँ।

 

अब तो जागो उठकर, ऐसा कुछ ऐलान करो,

फिर कोई बेटी रो न सके, ऐसा दंड-विधान करो।

 

जब तक नारी सुरक्षित न हो, कैसा विकास, उन्नति कैसी?

बेटी की मुस्कान बिना तो, हर उपलब्धि दिखावे जैसी।

 

आओ मिलकर शपथ उठाएँ, मानवता का मान रहे,

हर बेटी के सिर पर हरदम, सुरक्षा का वरदान रहे।

 

जिस दिन निर्भय होगी बिटिया, उस दिन होगा नव प्रभात,

वरना हर उपलब्धि झूठी, हर उत्सव की होगी मात।

 

पूर्णिमा सुमन

झारखंड धनबाद

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