
शबनम सी तू दिखती है।
कांच जैसी चमकती है।
कैसे मैं तिरे निकट रहुँ –
क्यूँ न मुझे ये कहती है।
ओस बिंदु सा कोमल तन।
चंचल है तेरा चितवन।
अधर मधुर मुस्कान प्रिय –
डोल रहा अब मेरा मन।
शीत लहर का प्रलय बहुत।
कांप रही है मही बहुत।
चलो चलें हम कहीं चलें –
गरम चाय की तलब बहुत।।
नाम मिरा भी तुषार है।
चारो ओर हि बहार है।
साथ रहना मुमकिन नहीं –
फिर लुप्त ही स्वीकार है।।
रचना मिश्रा “रूही”



