यूपी

ओस एवं उसके पर्यायवाची शब्द

रचना मिश्रा "रूही"

शबनम सी तू दिखती है।
कांच जैसी चमकती है।
कैसे मैं तिरे निकट रहुँ –
क्यूँ न मुझे ये कहती है।

ओस बिंदु सा कोमल तन।
चंचल है तेरा चितवन।
अधर मधुर मुस्कान प्रिय –
डोल रहा अब मेरा मन।

शीत लहर का प्रलय बहुत।
कांप रही है मही बहुत।
चलो चलें हम कहीं चलें –
गरम चाय की तलब बहुत।।

नाम मिरा भी तुषार है।
चारो ओर हि बहार है।
साथ रहना मुमकिन नहीं –
फिर लुप्त ही स्वीकार है।।

रचना मिश्रा “रूही”

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