आचार्य शीलक राम के काव्य- संग्रह ‘एक हारा हुआ विजेता’ का लोकार्पण

पुस्तक समाज को वैचारिक दृष्टि से आगे बढ़ाने का कार्य करेगी: प्रोफेसर अनामिका गिरधर ।
29 दिसंबर, कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र के दर्शनशास्त्र विभाग में विभाग के अस्सिटेंट प्रोफेसर डॉ. शीलक राम की पुस्तक काव्य-संग्रह ‘एक हारा हुआ विजेता का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर प्रोफेसर अनामिका गिरधर, अध्यक्षा, दर्शनशास्त्र विभाग ने अस्सिटेंट प्रोफेसर डॉ. शीलक राम आचार्य को बधाई देते हुए कहा कि आचार्य शीलक राम की पूर्व पुस्तकों की तरह ही यह पुस्तक भी समाज को वैचारिक दृष्टि से आगे बढ़ाने का कार्य करेगी। उन्होंने कहा कि डॉ. शीलक राम आचार्य प्रतिभा के धनी है उन्होंने पूर्व में अनेकों विषयों पर पचास से अधिक पुस्तकों का लेखन किया है जिससे भारतीय साहित्य को समृद्धि मिली है। काव्य-संग्रह ‘एक हारा हुआ विजेता’ में एक दार्शनिक और एक कवि दोनों ही रूप पढ़ने को मिलेंगे। इस संग्रह में मौजूद शताधिक कविताओं में कवि का जीवन-दर्शन प्रत्येक पंक्ति में उपस्थित है। जीवन-पथ पर चलते हुये जो-जो ठोकरें खाई हैं, जो-जो परेशानियां आई हैं, जो-जो बाधाएं आई हैं तथा अपने और परायों द्वारा दिये गये जो-जो विश्वासघात झेले हैं, उन सबकी सहज अभिव्यक्ति प्रस्तुत कविताओं में हुई है।
इस अवसर पर अस्सिटेंट प्रोफेसर डॉ. शीलक राम ने कहा कि आचार्य विश्वनाथ ने काव्य के संबंध में रसात्मकं वाक्यं ‘काव्य’ कहा है। जो रस प्रदान करे, वह काव्य है। जिससे रस की अनुभूति हो, वह काव्य है। जिसके लिखने और पढ़ने में आनंद की धार बहने लगे,वह काव्य है।केवल शब्दों का हेरफेर काव्य नहीं कहलाता है। केवल तुकबंदी काव्य नहीं होता है। जब तक भाव की प्रधानता न हो, जब तक अनाहत चक्र में स्फुरण न हो, तब तक किसी से काव्य अभिव्यक्त नहीं होता है। केवल विचार, तर्क, चिंतन और सोचने से काव्य निसृत नहीं हो सकता। इनके साथ भावनात्मक मैत्री आवश्यक है। इसीलिये कहा भी जाता है कि एक साहित्यकार बनने के लिये गद्य के साथ पद्य में गति होना चाहिये।
एक फिलासफर का कवि हृदय होना आवश्यक नहीं है। लेकिन सनातन धर्म और संस्कृति के अनुसार एक दार्शनिक का दार्शनिक के साथ कवि होना भी आवश्यक है। वेदों में कवि को ऋषि, समाधिस्थ, जाग्रत, आत्मस्थित कहा गया है। भारतीय संदर्भ में एक कवि दार्शनिक भी होता ही है। जब तक किसी साहित्यकार में विचार और काव्य दोनों की प्रतिभा न हो, वह साहित्यकार नहीं कहा जा सकता है। इस अवसर पर दर्शनशास्त्र विभाग के अस्सिटेंट प्रोफेसर डॉ. सुरेन्द्र कुमार, और नृत्य एवं संगीत विभाग के अस्सिटेंट प्रोफेसर डॉ. ज्ञान सागर और डॉ. दीपक शर्मा उपस्थित रहे।




