
यह सच है –कि
उनको पनाह नहीं मिलती,
इस जहान में…,
कब और कहाँ –आ जाये
पता नहीं,
सहारा मिले या नहीं,
एकांत हो या नहीं,
ग़म हो या खुशी,
उनको तो आना ही है,
बिन बुलाये मेहमान की तरह,
कई बार कहा है –कि,
एकांत में आया करो –पर,
वह, -आ -जाती है जब -मै,
महफ़िल में या लोगों के बीच
होता हूं…..,
और ….
आकर नम कर जाती है,नयनों को
और कहती है…,
भीड़ में भी तन्हा थे -तुम,
तभी तो मै, आती हूं -साथ देने को
इस तन्हाई में….,
मुझे तो पनाह भी नहीं मिलती,
घड़ी भर की —-तभी तो,
किसी ने सच ही कहा है…
इन आंसुओं को पनाह नहीं मिलती
इस जहाँ मे….. ||
शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली -पंजाब



