
जन्नत का चैन सुकून लगे,अब फिर से लौट के आयेगा।
अब तक हैं कितने दर्द सहे,इतिहास भुला ना पायेगा।।
कितनी सूनी हुई गोद,राखी की मिटी कलाइयाँ थी।
सिन्दूर तरसता रहा माँग,मातम की बस परछाइयाँ थी।।
नन्ही सी जान यूँ बिलखे ,माँ का प्यार सुला ना पायेगा।
अब तक हैं कितने दर्द सहे,इतिहास भुला ना पायेगा।।
अब तक तो खेली थी होली,खून भरी पिचकारी से।
गद्दारों ने बहुत डराया,पत्थर की बम बारी से।
अब की बार जो करी,हिमाकत कोई छुड़ा ना पायेगा।
अब तक हैं कितने दर्द सहे,इतिहास भुला ना पायेगा।।
बहुत हो गई आँख-मिचौनी,अब तो दुश्मन देख लिया।
करता चिकनी_चुपड़ी बातें,ढोंगी का तूने भेष लिया।।
लगा आग हम ऐसी देंगे,कोई बुझा ना पायेगा।
अब तक हैं कितने दर्द सहे ,इतिहास भुला ना पायेगा।।
घाटी में अब ना रण हो,खिलती यूँ ही रहेंगीं वादियाँ।
गद्दार बनेगा ना कोई, गूँजेंगी फिर शहनाईयाँ ।।
लहराएगा सदा तिरंगा,कोई झुका ना पायेगा।
अब तक हैं कितने दर्द सहे,इतिहास भुला ना पायेगा।।
जन्नत का चैन सुकून लगे,अब फिर से लौट के आयेगा।
अब तक हैं कितने दर्द सहे,इतिहास भुला ना पायेगा।।
शायर देव मेहरानियाँ _ राजस्थानी



