
अनुशासन का थाम हाथ, विजय मार्ग पर चलते जाना।
पार सकल बाधाएँ कर, ऊँचाई को छूते जाना।।
जीवन के सोपानों पर, मरीचिका ढेरों आएँगी।
विलग करेंगी पौरुष से, मन को नित ही भटकाएँगी।।
कंटक चुभे पाँव में पर, लक्ष्य प्राप्त कर ही मुस्काना।
पार सकल बाधाएँ कर, ऊँचाई को छूते जाना।।
करें टिप्पणी लोग अगर, मत हताश तुम बिल्कुल होना।
हो प्रयास यदि सफल कभी, सोच-सोच कर क्यों ही रोना।।
ध्येय धवल शुचि पावन हो, मत कुसंग खुद को उलझाना।
पार सकल बाधाएँ कर, ऊँचाई को छूते जाना।।
उद्बोधन गुरुजन का नित, सुनना गुनना पालन करना।
मात-पिता की वांछा को, लक्ष्य साधकर खरे उतरना।।
कर्मठता से ही बुनना, जीवन का शुभ ताना-बाना।।
पार सकल बाधाएँ कर, ऊँचाई को छूते जाना।।
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश



