
रास्ते भर यही सोचता रहा
मंज़िल मिलेगी क्या!!
खिड़की दरवाज़े सभी बंद है
फिर भला रोशनी की चलेगी क्या!!
इतना बदनाम तो रक़ीब भी नहीं होते
कभी घर बदलने की आहट सुनी क्या!!
साथ जीने मरने की क़समें झूठी थी
सुलह की बात कहीं चली क्या!!
हम पर तो सभी दरवाज़े बंद है
कभी धूप भी अपने घर रही क्या!!
बाहर के माहौल से अंदर भले
अंतर्मुखी व्यक्ति की कभी सुनी क्या!!
दोस्त सारे मतलब के यार निकले
तुमने दोस्तों की हक़ीक़त पढ़ी क्या!!
फ़र्क़ पड़ता है बहुत दिल को मेरे
कभी दिल की धड़कन सुनी क्या!!
हमको तो ज़माने भर का ग़म है
किसी महफ़िल में बात चली क्या!!
रास्ते भर यही सोचता रहा….
– राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान




