आलेख

अटल युग: लोकतंत्र, सुशासन और मानवीय मूल्यों की कहानी

सुनील कुमार महला

25 दिसंबर को हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। वे हमारे देश के एक ईमानदार, विचारशील और सर्वमान्य नेता थे,जो बहुत ही लोकप्रिय थे। वे तीन बार भारत के प्रधानमंत्री बने और पहली बार गैर-कांग्रेसी गठबंधन सरकार को पूर्ण कार्यकाल दिलाने वाले नेता रहे।पाठकों को बताता चलूं कि उनका जन्म 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में हुआ था। उनके पिता पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी एक शिक्षक और हिंदी साहित्य में रुचि रखने वाले व्यक्ति थे, जबकि उनकी माताजी का नाम श्रीमती कृष्णा देवी था। वाजपेयी जी का पालन-पोषण एक सुसंस्कृत, राष्ट्रप्रेमी और साहित्यिक वातावरण में हुआ, जिसने उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया। बचपन से ही उनमें अध्ययन, लेखन और वक्तृत्व(अच्छे ढंग से बोलने की कला) की विशेष रुचि दिखाई देती थी, जो आगे चलकर उन्हें एक संवेदनशील कवि और प्रभावशाली राजनेता के रूप में स्थापित करने का आधार बनी। दूसरे शब्दों में कहें तो उनमें अपने विचारों, भावनाओं या तर्कों को बहुत ही प्रभावशाली, स्पष्ट और आकर्षक ढंग से बोलकर प्रस्तुत करने की अभूतपूर्व कला थी।बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत एक पत्रकार के रूप में की थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वे ‘पाञ्चजन्य ‘और ‘वीर अर्जुन’ जैसे पत्रों से जुड़े रहे।राजनीति के साथ-साथ एक संवेदनशील कवि भी थे,जिनकी हिंदी भाषा पर बहुत ही अच्छी पकड़ थी। उनकी कविताएँ केवल साहित्य ही नहीं, बल्कि उनके जीवन दर्शन और राष्ट्रबोध की अभिव्यक्ति थीं। वे हिंदी के प्रखर समर्थक थे और संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण देने वाले पहले भारतीय विदेश मंत्री बने। पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि साल 1977 में विदेश मंत्री रहते हुए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में भाषण देकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाई।वे केवल संसद में ही नहीं, बल्कि मंच पर भी अपने संयमित और प्रभावशाली भाषणों के लिए प्रसिद्ध थे। कई बार विपक्ष भी उनके भाषण सुनकर प्रभावित हुआ करता था।वे कई बार चुनाव हारे, लेकिन वे ऐसे नेता थे जिनकी प्रशंसा उनके राजनीतिक विरोधी भी करते थे। कहना ग़लत नहीं होगा कि वे ‘राजनीति में मर्यादा का प्रतीक’ माने जाते थे। पाठक जानते होंगे कि अटल जी आजीवन अविवाहित(बैचलर) रहे, लेकिन उनके भीतर गहरा पारिवारिक भाव था और वे संबंधों को अत्यंत संवेदनशीलता से निभाते थे। अटल बिहारी वाजपेयी जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा से प्रेरित अवश्य थे, लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी सोच को किसी एक संगठन या विचारधारा तक सीमित नहीं रखा। कोई भी निर्णय लेते समय वे सबसे पहले राष्ट्रहित, लोकतांत्रिक मूल्यों और व्यापक सामाजिक सहमति को प्राथमिकता देते थे। आपसी संवाद में उनका विश्वास था, लेकिन उनकी खास बात यह थी कि वे असहमति को भी सम्मान देते थे। यही कारण था कि कई मुद्दों पर उन्होंने स्वतंत्र रूप से अपना मत रखा। फिर चाहे वह राजनीतिक विरोधियों से संवाद करना हो, विदेश नीति में संतुलन स्थापित करना हो या लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करना हो। वास्तव में यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि उनकी यही स्वतंत्र, संतुलित और समन्वयकारी सोच उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित करती है, जो केवल किसी संगठन का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र का नेता बन सका। इसी वजह से उन्हें अलग पहचान और सर्वस्वीकृति मिली। लाहौर बस यात्रा के जरिए भारत-पाक संबंधों में शांति का साहसिक प्रयास किया तथा उनके कार्यकाल में स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना जैसी ऐतिहासिक आधारभूत संरचना की शुरुआत हुई। गौरतलब है कि स्वर्णिम चतुर्भुज दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता को जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क है। यह भी उल्लेखनीय है कि ग्रामीण सड़कों के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की शुरुआत भी उन्होंने की थी। इतना ही नहीं, एक ओर जहां उन्होंने लाहौर बस यात्रा (1999) के माध्यम से भारत–पाक संबंध सुधारने की पहल। की वहीं दूसरी ओर कश्मीर समस्या के समाधान हेतु ‘इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत’ का संदेश भी दिया। उन्होंने देश में नई टेलीकॉम नीति लाई, जिससे मोबाइल और इंटरनेट आम लोगों तक पहुँचे तथा भारत को आईटी हब बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए। उन्होंने सरकारी कंपनियों के विनिवेश की नीति अपनाई तथा आर्थिक उदारीकरण को संतुलित और मानवीय दृष्टि से आगे बढ़ाया। सामाजिक कल्याण योजनाओं के तहत उन्होंने प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) की नींव रखी तथा शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में विस्तार पर जोर दिया। उन्होंने राज्य पुनर्गठन की प्रक्रिया को गति दी-तथा उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड का गठन हुआ। पाठकों को बताता चलूं कि अटल बिहारी वाजपेयी जी के प्रधानमंत्री कार्यकाल में नदी जोड़ो परियोजना को राष्ट्रीय महत्व की दूरदर्शी योजना के रूप में प्रस्तुत किया गया। उनका मानना था कि भारत में जल का असमान वितरण है-कुछ क्षेत्रों में बाढ़ आती है तो कई क्षेत्र गंभीर सूखे से जूझते हैं। इसी असंतुलन को दूर करने के लिए अतिरिक्त जल वाली नदियों को जल-अभाव वाले क्षेत्रों की नदियों से जोड़ने की परिकल्पना की गई। वाजपेयी सरकार ने वर्ष 2002 में इस परियोजना को गति दी, राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी को सशक्त किया और इसे राष्ट्रीय विकास एजेंडे का हिस्सा बनाया। इस परियोजना का उद्देश्य बाढ़ और सूखे की समस्या से निपटना, सिंचाई और पेयजल सुविधा बढ़ाना, कृषि उत्पादन में वृद्धि करना तथा जल संसाधनों का समग्र और संतुलित प्रबंधन सुनिश्चित करना था। यद्यपि उनके कार्यकाल में परियोजना का पूर्ण क्रियान्वयन नहीं हो सका, फिर भी इसे राष्ट्रीय नीति और विमर्श के केंद्र में लाने का श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी जी को ही जाता है।वर्ष 1998 में पोखरण में भारत द्वारा किए गए परमाणु परीक्षण (पोखरण–II) के बाद विश्व स्तर पर भारत पर कड़ी प्रतिक्रियाएँ आईं। कई देशों ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिए थे और यह आशंका जताई कि भारत आक्रामक परमाणु शक्ति बन सकता है। ऐसे संवेदनशील समय में भी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने अत्यंत दूरदर्शिता और संतुलन का परिचय दिया था। उन्होंने पूरे विश्व के समक्ष यह स्पष्ट किया कि भारत ने परमाणु हथियार किसी पर हमला करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और आत्मरक्षा के लिए विकसित किए हैं। उन्होंने यह भी दोहराया कि भारत की नीति ‘पहले प्रयोग न करने’ (नो फर्स्ट यूज) की है और भारत हमेशा शांति, संवाद और निरस्त्रीकरण का पक्षधर रहेगा। इसके साथ ही उन्होंने दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत एक जिम्मेदार, लोकतांत्रिक और शांति-प्रिय राष्ट्र है, जो शक्ति के साथ संयम भी जानता है। यही संतुलित दृष्टिकोण भारत को अंतरराष्ट्रीय समुदाय में सम्मान दिलाने में सहायक बना और यह अटल बिहारी वाजपेयी जी की राजनीतिक दूरदर्शिता का स्पष्ट प्रमाण है। उनकी कविताएं जीवन, देशभक्ति की अभिव्यक्ति हैं। पाठकों को बताता चलूं कि अटल बिहारी वाजपेयी जी के जीवन में जब कभी भी राजनीतिक असफलताएँ, आलोचनाएँ और व्यक्तिगत पीड़ा के क्षण आए, तब उन्होंने कविता को अपने भाव व्यक्त करने का माध्यम बनाया।अटल बिहारी वाजपेयी भारत के ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जो राजनीति के साथ साहित्य और कविता को समान रूप से जीते थे।वास्तव में वे एक संवेदनशील कवि थे तथा उनकी कविताओं में राष्ट्र, मानवता और करुणा की गूंज मिलती है। उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी में कई पुस्तकें लिखीं, जिनमें उनकी कविताएँ और राजनीतिक अनुभव शामिल हैं। उनके प्रमुख काव्य-संग्रहों में क्रमशः मेरी इक्यावन कविताएँ, संसद से सड़क तक, अमर आग है, कुछ लेख : कुछ भाषण तथा कदम मिलाकर चलना होगा आदि शामिल हैं। इतना ही नहीं उनके लेखों, भाषण और विचार-संग्रह में क्रमशः ‘जनसंघ और मुसलमान’, ‘राष्ट्रधर्म’, ‘भारत की विदेश नीति : नए आयाम’ तथा ‘चार दशक संसद में’ भी शामिल हैं। ‘मृत्यु या हत्या’ तथा ‘राजनीति की रपटीली राहें’ उनके अन्य संकलन हैं। उनकी कविताओं में केवल शब्द नहीं, बल्कि अनुभव, पीड़ा और आशा झलकती है।उदाहरण के रूप में 1960-70 के दशक में जब वे लगातार चुनाव हार रहे थे और उनकी पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही थी, उस समय उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पंक्तियाँ लिखीं-‘हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा,काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ…’ वास्तव में, इन पंक्तियों में उनका संघर्ष, आत्मविश्वास और जिजीविषा स्पष्ट दिखाई देती है। दरअसल,उनकी यह कविता यह बताती है कि निराशा के क्षणों में भी वे टूटे नहीं, बल्कि भीतर से और मजबूत हुए। एक अन्य उदाहरण में, जीवन की नश्वरता और पीड़ा को वे इस प्रकार व्यक्त करते हैं-‘ मौत से ठन गई,जीवन से रण…।’ यह पंक्तियाँ उनके भीतर चल रहे मानसिक द्वंद्व और जीवन-संघर्ष को दर्शाती हैं। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि अटल जी के लिए कविता केवल साहित्य नहीं थी, बल्कि आत्मसंवाद, आत्मबल और जीवन को समझने का साधन थी। यही काव्यात्मक संवेदनशीलता उनके व्यक्तित्व को गहराई और मानवीयता प्रदान करती है।अटल बिहारी वाजपेयी जी के लिए राजनीति सिर्फ सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं थी, बल्कि वह देश और समाज की निःस्वार्थ सेवा का मार्ग थी। वे पद, प्रतिष्ठा या व्यक्तिगत लाभ की राजनीति में विश्वास नहीं रखते थे। अटल जी सत्ता में हों या विपक्ष में, उन्होंने हमेशा राष्ट्रीय हित, लोकतांत्रिक मर्यादाओं और नैतिक मूल्यों को प्राथमिकता दी। विपक्ष में रहते हुए भी उन्होंने सरकार की अच्छी नीतियों का समर्थन किया और आलोचना करते समय भाषा की मर्यादा बनाए रखी। यह दर्शाता है कि उनके लिए राजनीति संघर्ष नहीं, संवाद और समाधान का माध्यम थी। प्रधानमंत्री रहते हुए भी उनका व्यवहार सादा, विनम्र और जवाबदेह रहा। उन्होंने कभी सत्ता का दुरुपयोग नहीं किया और न ही असहमति को दबाने का प्रयास किया। यही कारण है कि जनता और राजनीतिक विरोधी दोनों उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखते थे। दूसरे शब्दों में कहें तो उनकी पहचान संयमित, उदार और संवादप्रिय राजनेता की थी, यही कारण भी था कि विपक्ष भी उनका सम्मान करता था।उनकी राजनीति साधना जैसी थी-निष्ठा, संयम और राष्ट्रप्रेम से प्रेरित। उन्होंने हमेशा गांधी और भगत सिंह के आदर्शों को अपने जीवन और राजनीति में अपनाया तथा राजनीति में कई उतार-चढ़ाव, कारावास और संघर्ष देखे, फिर भी कभी कट्टरता नहीं दिखाई।यही मूल्य उन्हें सामान्य राजनेताओं से अलग और विशिष्ट बनाते हैं। अंत में यही कहूंगा कि अटल बिहारी वाजपेयी जी केवल हमारे देश के प्रधानमंत्री ही नहीं, बल्कि ऐसे राष्ट्रनायक थे, जिन्होंने विकास, लोकतंत्र, मानवीय संवेदना और राष्ट्रीय स्वाभिमान को एक साथ साधा। वर्ष 2015 में उन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।उनकी जीवनशैली और विचार आज भी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं और भविष्य में भी वे भारतीय राजनीति में सदैव प्रेरणास्रोत रहेंगे।

 

सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, उत्तराखंड।

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