साहित्य

बड़ा भाई (कविता )

गौरव राठौर

बड़ा भाई (कविता )
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पिता जब समय की छड़ी थाम
धीरे-धीरे झुकने लगता है,
तब घर के आँगन में
एक बचपन
चुपचाप विदा ले लेता है—
वह बचपन
जो बड़े बेटे के नाम लिखा था।

खिलौनों की जगह
उसे सौंप दी जाती हैं जिम्मेदारियाँ,
और कंधों पर रख दिया जाता है
पूरा परिवार सँभालने का भार।
वह बन जाता है
बूढ़े पिता की आँखों की रोशनी,
और उनकी लड़खड़ाती हिम्मत की लाठी।

छोटे भाई-बहन
सदैव छोटे ही रह जाते हैं,
क्योंकि उनके सिर पर
चट्टान बनकर खड़ा रहता है
एक बड़ा भाई—
जो आँच को त्वचा तक पहुँचने नहीं देता,
और आँधी को द्वार पर ही थाम लेता है।
फिर भी माता -पिता का स्नेह, प्रेम रहता है सिर्फ छोटो पर, क्योंकि बड़े को कह दिया जाता है कि तू तो समझदार है l

यदि किसी छोटे की आँखों में
किसी स्वप्न की भूख जाग उठे,
तो वह अपने हिस्से का आकाश
बिना शोर किए काट देता है।
वह अधिकार नहीं माँगता,
वह केवल
कर्तव्य निभाता है।

उत्सव हों या शोक,
विवाह हो या श्मशान—
सबके हाथ प्रश्नचिह्न बन जाते हैं,
उत्तर हर बार
बड़े भाई के पास होता है।

पत्नी के संग
वह पूरे परिवार की साँसें ढोता है,
और अपनी थकान
रात की गोद में
चुपचाप सुला देता है।

जब छोटो की बारी आती है टो
अपने-अपने रास्ते चुन अलग हो जाते हैं,
तो वह
वट-वृक्ष की भाँति
वहीं खड़ा रह जाता है—
छाया देता हुआ,
धूप, हवा और
समय के सभी तूफ़ानों को
अपने ऊपर झेलता हुआ।
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गौरव राठौर
कोटा, राज.
मो. 9887165828

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