साहित्य

बीते को समेटो, नई उम्मीदें भरो…!

मदन वर्मा "माणिक"

समस्याएं भी आई होगी,
आती है तो जाएगी भी।

दुख भी आकर चले जाता,
वैसे सुख भी आता जाता,

इंसान आता फिर उठ जाता,
यहां कुछ नहीं होता स्थिर है।

आते जाते कई वर्ष बदल गए,
किन किन को खोए, कौन नए।

बीते का निष्कर्ष निकालो करो समीक्षा,
खोया क्या पाया इसका क्या समय बचा।

फिर भी बीते को समेटो, नई उम्मीदें भरो,
नवसृजन विधा पताकाओं को विस्तार दो।

अभ्युदय करना है नये मनोरथ गढ़ो,
नयेवर्ष आलिंगन का अमृतकुंभ भरो।।

– मदन वर्मा “माणिक”
इंदौर , मध्यप्रदेश

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