साहित्य

भोजपुरी क माटी

चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन "

भोजपुरिया माटी ह गीतन क,
जहं कन कन संगीत लुभावेला।
मउत हो जिनगी सुख दुःख कउनो,
हरदी चंनन क लेप लगावेला।।
लोकमन क पनपल गीत इहाँ,
हर चरवाहा हिय भी गावेला।
विरहिन के नयनन से उपजल,
अँसुवन जल विरह सुनावेला।।
कजरी क अँचरा थामि बदरवा,
जब नयना से नेह चुआवेला।
सावन भादो क रसवंती रिमझिम
जब मधुरस क पेग बढ़ावेला।।
अमराई में झलुआ पड़ जाला,
बस साजन क याद सतावेला।
कब अइहं मोर सजनवा हो रामा,
हिय रहि रहि यही हिलोरे ला।।
भोजपुरिया माटी ह पंथिन क,
प्रभु भगतन के राह देखावेला।
पुरुआ पछुआ कहे सर ररअ,
निर्गुन आपन साख जमावेला।।
जोगियन क धमाली गूँजे इहाँ,
कबिरा भी लोकमन झुमावेला।
डाड़ा मेड़ी गहिरे झुमटा जाला,
“जोगी जी धीरे धीरे “गोहरावेला।।
अवधपुरी के पूरब रहवइयन क,
मुँहवा जइसन बोल उचारेला ।
साँस्कृत्यायनजी क कहनाम यही,
उ गोरखपुरिया भोजपुरी कहावेला।।
चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन ”
चलभाष -9305988252🙏

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