
वो पलटने का दम,
रखते थे समुद्री लहरों को,
उनके आगे थी भला!
हिम्मत ठहरने की किसको?
आज़ादी की कीमत,
सिर्फ मशहूर नामों ने नहीं,
बल्कि अनगिनत….
अज्ञात चेहरों ने चुकाई थी।
जो राम प्रसाद बिस्मिल,
के नेतृत्व में काकोरी कांड
को अंजाम दिए थे।
काकोरी ट्रेन एक्शन,
सशस्त्र कार्यवाही नहीं,
अपितु ब्रिटिश साम्राज्य के
खिलाफ खुला ऐलान था!
जिस क्रांति में कई एक नाम था।
जिन्होंने 19 दिसंबर 1927
को राम प्रसाद बिस्मिल, के साथ
हँसते-हँसते फाँसी वरण किए
और वीरगति को प्राप्त हुए।
गुमा आज भी है उनपर उतना।
खुद पर कभी कर ना पाए जितना।
✍️ कविता ए झा
नवी मुम्बई




