आदरणीय श्री चंद्रगुप्त प्रसाद वर्मा ‘अकिंचन’ जी के नाम पत्र
सादर प्रणाम।
भोजपुरी भाषा, लोकसंस्कृति और नाट्य परंपरा के जिस समृद्ध प्रवाह को आपने अपनी सृजनशीलता, साधना और प्रतिबद्धता से आगे बढ़ाया है, वह केवल कला का विस्तार नहीं, बल्कि समाज की आत्मा को स्वर देने का कार्य है। आप उन विरल सर्जकों में हैं, जिनके लिए नाटक केवल मंचीय प्रदर्शन नहीं, बल्कि लोकजीवन का जीवंत दस्तावेज़ है।
आपकी लेखनी में गाँव की मिट्टी की सोंधी सुगंध है, श्रमजीवी समाज की पीड़ा है, लोकहास्य की सहजता है और जीवन-संघर्ष की गहरी समझ है। भोजपुरी नाट्य शैली की विविध विधाओं—लोकनाट्य, सामाजिक नाटक, व्यंग्य, प्रतीकात्मक प्रस्तुति—को आपने जिस आत्मीयता से साधा है, वह आपको एक साधारण रचनाकार से ऊपर उठाकर सांस्कृतिक प्रहरी के रूप में स्थापित करता है।
आपका ‘अकिंचन’ होना वास्तव में आपकी विनम्रता का परिचायक है, किंतु आपकी रचनात्मक उपलब्धियाँ किसी भी दृष्टि से अकिंचन नहीं हैं। आपने यह सिद्ध किया है कि बड़े पद, बड़े मंच या बड़े संसाधन ही सृजन की शर्त नहीं होते—सच्ची संवेदना, लोक से जुड़ाव और ईमानदार दृष्टि ही रचनाकार को महान बनाती है।
आज जब बाज़ार और दिखावे के शोर में लोकभाषाएँ और लोकनाट्य हाशिये पर धकेले जा रहे हैं, तब आपका सतत सृजन एक सांस्कृतिक प्रतिरोध की तरह खड़ा दिखाई देता है। आपकी रचनाएँ आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाएँगी कि अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपनी जड़ों से जुड़कर ही कोई समाज आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़ सकता है।
मेरी यह कामना है कि आपकी सृजनशीलता निरंतर नई ऊँचाइयों को छुए, आपकी लेखनी लोकमंगल का पथ प्रशस्त करती रहे और भोजपुरी रंगमंच आपके माध्यम से और अधिक समृद्ध हो।
इन्हीं भावनाओं के साथ
आपको सादर नमन, अभिनंदन और हार्दिक शुभकामनाएँ।
अरविंद शर्मा ✍️




