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चाय अब बस नाम नहीं बन गई जान है हमारी।
तुरन्त स्फूर्ति की बन गई जैसे एक पहचान है हमारी।।
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जाड़ा या बरसात सब चाय के ही तलबगार रहते हैं।
चाय की चाह में सबही आलसी या होशियार रहते हैं।।
इलाइची,तुलसी,अदरक,की चाय दवा निदान है हमारी।
चाय अब बस नाम नहीं बन गई जान है हमारी।।
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उबलती खौलती चाय हर एक घूंट में मज़ा देती है।
ताजगी हमारे हर एक अंग तन-बदन में सजा देती है।।
सुबह शाम बस चाय आराम का निशान है हमारी।
चाय अब बस नाम नहीं बन गई जान है हमारी।।
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आने-जाने में पीने पिलाने का दस्तूर बन गई है चाय।
मेजबान मेहमान दोनों को ही चाय ही बहुत सुहाए।।
चाय एक अमृतपेय दोस्ती करा देती अनजान से हमारी।
चाय अब बस नाम नहीं बन गई जान है हमारी।।
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जब मामला फिफ्टी-फिफ्टी मां पहले चाय पे बुलाती है।
जब बनते दामाद जी तभी ही पकवान वो खिलाती है।।
चाय के साथ – साथ ही बातें भी चढ़ती परवान हैं हमारी।
चाय अब बस नाम नहीं बन गई जान है हमारी।।
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रचयिता।।एस के कपूर “श्री हंस”
बरेली।।




