यूपी

डॉ. विश्वनाथ जी का साहित्य में बड़ा रूप था: डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र

डॉ. विश्वनाथ प्रसाद साहित्य सम्मान से सम्मानित हुए तीन रचनाकार

वाराणसी।विद्याभूषण डॉ विश्वनाथ प्रसाद जी की जयंती ( 25 दिसम्बर) के सुअवसर पर राजकीय जिला पुस्तकालय,अर्दली बाज़ार में डॉ. विश्वनाथ प्रसाद साहित्य सम्मान से तीन साहित्यकार डॉ कविन्द्र नारायण श्रीवास्तव, धर्मेन्द्र गुप्त साहिल तथा केशव शरण जी को अंगवस्त्र, स्मृति चिन्ह एवं सम्मान पत्र से सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए नवगीतकार डॉ बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि डॉ. विश्वनाथ जी का साहित्य में बड़ा रूप था। मेरे लिए बनारस का मतलब डॉ विश्वनाथ प्रसाद हैं। डॉ. विश्वनाथ प्रसाद जी का साहित्य को तलाशने,तराशने और परखने की अनोखी दृष्टि थी जिसमें जिंदगी की स्वाभाविकता के साथ सरलता और सहजता के दर्शन भी होते हैं। इस अवसर पर उन्होंने एक गीत सुनाया ‘ तुम क्या गये नखत दीपों के असमय अस्त हो हुए ‘। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में कथाकार डॉ नीरजा माधव ने कहा कि विश्वनाथ जी का साहित्य जीवन के हर क्षेत्र से फूटता है। यही उनके साहित्य का सौंदर्य है। उनके साहित्य में सही जमीन, तनाव और द्वन्द है। यह द्वन्द व्यक्ति और समाज का है। उनका सृजन मर्मस्पर्शी तथा गंभीर है। विशिष्ट अतिथि महेश चंद श्रीवास्तव ( पूर्व अध्यक्ष काशी क्षेत्र, भाजपा ) ने कहा कि यथार्थ के अन्दरूनी संसार को लयवद्ध करती हैं विश्वनाथ प्रसाद की रचनाएं किसी आश्चर्यलोक का सृजन नहीं करतीं बल्कि वर्गचरित्री सस्कारों के दवाबों के रिश्ते की व्याख्या करने की कोशिश भी करती हैं। प्रो. इंदीवर ने कहा कि डॉ विश्वनाथ प्रसाद जी के ‘चुटकी भर अपनापन’ में जीवन के अनेक अनुभव हैं। इन अनुभवों से छनकर आई हुई राग की झंकृतियों ने कविताओं को रच दिया है। वे नवगीत के सशक्त समीक्षक थे। डॉ मुक्ता ने कहा कि डॉ विश्वनाथ जी के साहित्य के अनगिनत दरवाज़े हैं। जो जीवन के हर दरवाजे से गुजरता है। उनके साहित्य में सौंदर्य और प्रेम दोनों है। और कुंवर जी में परिवार से जोड़ने तथा हर व्यक्ति को अपना बना लेने की कला थी। उनके कविताओं की कुछ पंक्तियाँ मुझे छू गईं। प्रो श्रद्धानंद ने कहा कि पूर्वांचला नामक ग्रंथ विश्वनाथ प्रसाद जी की विशिष्ट कृति है।वे साहित्य के लिए अकेले एक संस्था के रूप में कार्य कर रहे थे। उनके निबंधों में जीवन का अद्भुत सौंदर्य है। इस अवसर पर समीक्षक डॉ रामसुधार सिंह ने कहा कि एक बड़े रचनाकारों में जो ताकत होनी चाहिए वह विश्वनाथ जी के साहित्य में था। सारस्वत अतिथि*श डॉ दया निधि मिश्र ने कहा कि ने कहा कि विश्वनाथ जी हम लोग के बीच एक बड़ा शून्य छोड़ गये। प्रो. सत्यपाल शर्मा ने कहा कि विश्वनाथ जी मेरे गुरु और देश के बड़े विद्वानों में से एक थे। डॉ विश्वनाथ जी केवल साहित्य का ही निर्माण नहीं कर रहे थे बल्कि संस्थागत रूप से साहित्यकारों का भी कर रहे थे। ‘लड़कीनामा’ जैसा लेख केवल विश्वनाथ जी ही लिख सकते थे उनके पास शब्दों के गंध की पहचान थी। प्रो निरंजन सहाय ने कहा कि उनके साहित्य के उजास से हम सभी प्रेरित होते हैं। विश्वनाथ अपने को केन्द्र में रखकर चीजों को देखते-परखते हैं इसलिये खुद को भी नहीं बख्सते-और यह स्वीकार करते हैं कि सांस्कृतिक अवमूल्यन और नैतिक ह्रास में उनका भी अनिवार्य साझा है। इसलिए उनकी रचनाएं प्रश्नचिन्ह नहीं लगाती, सीधे-सीधे संवोधन बन जाती हैं भाषा को सर्वथा नया स्पर्श देते हुए । प्रो प्रकाश उदय ने कहा कि विश्वनाथ प्रसाद जी की रचनाएं जीवन से उपजती है। जिसमें जिन्दगी के बीच से गुजरते हुए अनेक प्रकार के अनुभव होते हैं। जो अनुभव मन को छू लेते हैं, उनके साथ उनकी संवेदना जुड़ती है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ रामसुधार सिंह ने किया। स्वागत उद्बोधन पुस्तकाल्याध्यक्ष कंचन सिंह परिहार ने किया। कार्यक्रम का संयोजन एवं आभार संस्था सचिव डॉ सीमांत प्रियदर्शी ने किया। स्वागत ऋचा प्रियदर्शिनी ने किया। विश्वनाथ जी के पौत्र शार्दुल प्रियदर्शी ने उनकी कविता ‘आवाज़’ का वाचन किया। इस अवसर पर सोच विचार के संपादक नरेन्द्रनाथ मिश्र, डॉ बेनी माधव, प्रो शशिकला पाण्डेय, डॉ अत्रि भारद्वाज, गौतम अरोड़ा ‘सरस, सुरेंद्र वाजपेयी, हिमांशु उपाध्याय, डॉ.रामेश्वर त्रिपाठी, डॉ आशीष कु चौबे, आनन्द कृष्ण मासूम , कुंवर सिंह कुंवर, मनोज श्रीवास्तव, आदि बड़ी संख्या में रचनाकार उपस्थित रहे।

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