साहित्य

दबे पाँव फिर आयी सर्दी

नरेश चन्द्र उनियाल

पड़ने लगी है चाय में अदरक,
मूंगफली का सीजन आया,
चने चाबने लगे लोग हैं,
गज्जक और कड़ाका आया,
निकल गये हैं स्वेटर जैकेट,
निकल गई फिर गरम है वर्दी,
पता ही नहीं चल पाया कब,
दबे पाँव फिर आयी सर्दी।

शीत लहर से समां कांपता,
ज्यों-ज्यों दिन बढ़ते जाते हैं,
ठिठु-ठिठुर करता है अब तन
कपड़े बस बढ़ते जाते हैं,
सुन्न पड़ रहे हाथ ठण्ड से,
नाक की हालत पतली कर दी,
पता ही नहीं चल पाया कब,
दबे पांव फिर आई सर्दी।

निकल गईं हैं बड़ी रजाई,
हुई और भी मोटी स्वेटर,
एसी कोई चला रहा तो,
कोई चालू करता हीटर,
भाप मुंह से निकल रही है,
समय बड़ा ही है बेदर्दी,
पता ही नहीं चल पाया कब
दबे पाँव फिर आयी सर्दी।

ठिठुर ठिठुर कर गात कांपता,
दाँत कटकटाते हरदम हैं,
लाल नाक भी हो जाती है,
ओस बिंदु से धरती नम है,
सबकी पतली हुई है हालत,
ठण्ड बड़ी यह है बेदर्दी,
पता ही नहीं चल पाया कब,
दबे पाँव फिर आयी सर्दी।

✍️ नरेश चन्द्र उनियाल,
पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड।

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