
आधुनिकता के इस दौर में
बिकती है किताबें फुटपाथ पर,
करते हैं लोग मोलभाव,
और फिर छोड़ जाते हैं,
इन्हें धूल खाने को…..
मैं रोज लाता हूँ इन्हें
कमरे से उठाकर फुटपाथ पर,
और फुटपाथ से उठाकर,
ले जाता हूं पुनः कमरे पर…..
कोई नहीं पूछता इन्हें भी मेरी ही तरह,
ये भी बेकार-अनुपयोगी हैं अब मेरी तरह…..
फिर थाम लेता हूँ मैं इन्हें और ये मुझे,
पढ़ता रहता हूँ रात भर,
हर्फ-दर-हर्फ-शब्द दर शब्द,
घोटता रहता हूँ इन्हें,
घुटता रहता हूँ मैं,
ये सोख लेती हैं मेरे आँसू,
और पसीज -सी जाती हैं,
धुँधले होते जाते हैं इनके अक्षर,
और मेरी आँखों की रोशनी,
न किसी को इनकी ज़रूरत है,
और न ही मेरी।।।।।
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश




