साहित्य

एक रोज अकेले चलना होगा

डॉ उदयवीर सिंह

अहसास न था मुझको एक रोज अकेले चलना होगाI
जीवन के पथ शूलों से एक रोज तन्हा गुजरना होगाII
अपने ही बस अपने थे,सब बारी बारी से बिछुड़ गएI
हो विवस् काल खंड के,वह इस जग से बिछुड़ गएII
हमसफर बने स्वार्थ से जो,देख समुद् मुख मोड़ गएI
चहुँ ओर लखूं मैं साहिल पर,मुझको तन्हा छोड़ गएII
सागर में उठते तूफ़ानों से, मुझको ही टकराना होगाI
अपनी जीवन कश्ती को,ख़ुद उस पार लगाना होगाII
जख्मी हूं पर खातिर मंजिल की श्रम तो करना होगाI
घायल कदमों से मुझको,अपने पथ पर चलना होगाII
अहसास न था मुझको एक रोज अकेले चलना होगाI
जीवन के पथ शूलों से एक रोज तन्हा गुजरना होगाII

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!