गेहूं की फसल में मंडूसी बना बड़ा खतरा, समय पर नियंत्रण जरूरी

गेहूं की फसल में इन दिनों खरपतवारों का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है, जिनमें फैलारिस माइनर अर्थात मंडूसी सबसे खतरनाक मानी जाती है। इसे ग्रामीण क्षेत्रों में गुल्ली-डंडा, गेहूं का मामा और कनकी के नाम से भी जाना जाता है। यदि समय रहते इसका नियंत्रण न किया जाए, तो यह फसल की पैदावार को 10 से 70 प्रतिशत तक नुकसान पहुँचा सकती है। कृषि विज्ञान केंद्र, हाथरस के वैज्ञानिक डॉ. बलवीर सिंह के अनुसार मंडूसी देखने में गेहूं के समान होती है, जिससे प्रारंभिक अवस्था में इसकी पहचान कठिन हो जाती है और यह खाद, पानी व धूप के लिए फसल से सीधी प्रतिस्पर्धा करती है।
डॉ. सिंह ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में आइसोप्रोटूरॉन जैसी पारंपरिक खरपतवारनाशी दवाओं के प्रति मंडूसी में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई है, जिससे वे प्रभावी नहीं रहीं। पहली सिंचाई के बाद खरपतवार उगने की संभावना अधिक रहती है, इसलिए इसी अवधि में विशेष सतर्कता आवश्यक है। उन्होंने कहा कि खरपतवार नियंत्रण की शुरुआत प्रमाणित बीजों के चयन, बीज उपचार, उचित खेत तैयारी, सही बीज दर तथा उपयुक्त गहराई पर बुवाई से होती है, जिससे मंडूसी का प्रकोप काफी हद तक कम किया जा सकता है।
खरपतवारनाशी दवाओं के प्रयोग में सावधानी बरतने की सलाह देते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि कभी भी दवा को खाद या मिट्टी में मिलाकर छिड़काव नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे दवा का प्रभाव कम हो जाता है और फसल को नुकसान पहुँच सकता है। चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिए मेटसल्फ्यूरान (8 ग्राम प्रति एकड़) प्रभावी है, जबकि केवल मंडूसी के नियंत्रण हेतु क्लोडिनाफॉप (160 ग्राम प्रति एकड़) या सल्फोसल्फ्यूरान (13 ग्राम प्रति एकड़) का प्रयोग किया जा सकता है। मिश्रित खेती, विशेषकर गेहूं के साथ सरसों या दलहनी फसलों की स्थिति में, खरपतवारनाशी दवाओं के उपयोग से बचना चाहिए।
उन्होंने बताया कि जिन खेतों में मंडूसी सामान्य दवाओं से नियंत्रित नहीं हो रही है, वहाँ बिक्सलोज़ोन 50 प्रतिशत + मेट्रिब्यूज़िन 10 प्रतिशत डब्ल्यूजी नामक खरपतवारनाशी दवा का 600 ग्राम दवा के साथ 400 मिलीलीटर सेफनर प्रति एकड़ प्रयोग प्रभावी समाधान है। इन सभी खरपतवारनाशी दवाओं का छिड़काव तभी करें जब खरपतवार 2 से 4 पत्ती की अवस्था में हों। छिड़काव के लिए 200 लीटर पानी प्रति एकड़, फ्लैट-फैन नोज़ल का प्रयोग करें।
अंत में डॉ. सिंह ने किसानों से अपील की कि यदि दवा के प्रयोग के बाद भी कुछ मंडूसी के पौधे खेत में बच जाएँ, तो उन्हें बीज बनने से पहले जड़ सहित उखाड़कर खेत से बाहर निकाल दें, ताकि आने वाले वर्षों में खरपतवार का प्रकोप न बढ़े।