साहित्य

गुलाबी ठँड

दिनेश पाल सिंह दिलकश*

गुलाबी ठंड में जब से तेरी क़ुर्बत मिली है,
सर्द रातों को भी अब एक नर्मी मिली है।

तेरी साँसों की गरमाहट में घुली है सुबह,
धूप ने आज बदन ओढ़ने की हिम्मत मिली है।

तेरे आँचल की छुअन ने किया ऐसा जादू,
बर्फ़-सी जमी हुई रूह को राहत मिली है।

लबों की थरथराहट में छुपा इश्क़ का असर,
इस गुलाबी ठंड को भी शरारत मिली है।

न शाल की ज़रूरत, न अलाव की ख़्वाहिश,
तेरी बाहों से ही हर साँस को ताक़त मिली है।

सुबह की चाय, तेरा पास आकर बैठना,
इस सर्द मौसम को पूरी इबादत मिली है।

तेरी नज़रों ने जब छेड़ा है मौसम को,
हर फ़िज़ा को नये ख़्वाबों की दस्तक मिली है।

“दिलकश” कहे, ये गुलाबी ठंड गवाह है अब,
इश्क़ को हर ऋतु में नयी पहचान मिली है।

*दिनेश पाल सिंह दिलकश*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*

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