साहित्य

सरसी छंद मुक्तक एवं दोहा मुक्तक

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

भरत भूमि है वीर प्रसूता, प्रकृति मिली वरदान।
अनुपम रचना प्रभुवर की है, नारी सृष्टि महान।
सारी बाधा जो हर लेती, ममता-समता साथ,
जीवन को सुखमय है करती,सबका रखती ध्यान।।

पूजन वंदन शिव का करती, दर्शन आठों याम‌।
मन मंदिर में सदा विराजें, सुखमय करते धाम,
करें कृपा भक्तों पर हरदम, महिमा बड़ी अपार, ,
इसीलिए हे जग वालों तुम,जपो सदा प्रभु नाम।।

मातु सिया से है मिला, हनुमत को वरदान।
करें हृदय में वास हैं,जिनके कृपा निधान।
भेदन करते लक्ष्य का,लेकर प्रभु का नाम,
करते नित कल्याण हैं,करे सदा जो ध्यान।।

सच्चाई की राह पर,चलता जब इंसान।
हर बाधा तब दूर हो, बने जगत पहचान।
मिलती गुरु की है कृपा,रहे समुन्नत भाल,
धर्म-कर्म की नीति से,सफल सभी अभियान।।

मेधा मुझको दीजिए,जपूँ आपका नाम।
आप देवता न्याय के,हरते कष्ट तमाम।
सूर्य पुत्र शनिदेव जी,रखते सबका मान,
धर्म-कर्म पथ जो चले,पूरण करते काम।।

भरा तेज जिसके हृदय,करें तमस का नाश।
स्वागत करती है धरा, प्रमुदित हो आकाश।
जागृत होती चेतना,करते सब जन कर्म,
सूर्य देव की रश्मियाँ,फैला रही प्रकाश।।

अरुणोदय का शुभ समय, खोना मत इंसान।
उठकर प्रातः काल में, प्रभुवर का कर ध्यान।
सफल सदा होता वही, करता समय प्रयोग,
लाते सुखद बिहान है,सूर्य देव भगवान।।

सत्य धर्म संकल्प ले,करिए सतत् विकास।
मानवता जिसके हृदय, खुशियांँ होती पास।
अविनाशी शिव शंभु है, रहते हर पल साथ,
करते भक्तों पर कृपा,अंतस भरे उजास।।

सच्ची करिए साधना,खुले मोक्ष का द्वार।
करिए शिव अभिषेक नित, हृदय भक्ति का सार।
जटा जूट में गंग हैं,भस्म लपेटे अंग,
हरते जग का हैं तिमिर, बरसे कृपा अपार।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!