साहित्य

हारा हुआ मन

संजय मृदुल

टूट के जब भी बिखरना
एक टुकड़ा संजो कर रख लेना पास
लोग यादें भी नही छोड़ते पास
खो जाओगे कहीं अपरिचित भीड़ में
बिसरा दिए जाओगे।
वो टुकड़ा बो देना किसी गमले में
रख देना कहीं खुली जगह में
जहाँ हवा मिलती रहे
बारिश में पानी पड़ता रहे
थोड़ी धूप और जरा सी छाँव
आते जाते नजर पड़ती रहे
लोगों की अनचाहे ही सही
कहीं कभी मौसम अच्छा रहा
तो फिर कोपलें फूटेंगी तुममे
फिर जड़ें मजबूत होंगी
टहनियाँ फैलाएंगी बाहें
कलियाँ भी खिल जाएंगी
हालांकि ऐसा कम ही होता है
कि टूट के बिखर कर
फिर कोई जुड़ जाए
खड़ा हो पाए मजबूती से।
तुम हारना मत
उस टुकड़े पर विश्वास रखना
जरा भी सँचार होगा बाकी
तो फिर जागेंगी उम्मीदें
फिर जिंदगी गुलजार होगी
फिर से मुस्काएगी
फिर जी उठना तुम।
©संजय मृदुल
रायपुर

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