
स्मृति के किसी कोने में,
किसी द्वंद के होने न होने में,
रातरानी चुपचाप गुज़र गई
हक़ीक़त की गठरी ढोने में।
किसी वृत्त की भाँति जीवन,
लौट- लौट फिर आता है,
मद्धम – मद्धम जा के समय
प्रवाह में ढल जाता है।
आकिब जावेद

स्मृति के किसी कोने में,
किसी द्वंद के होने न होने में,
रातरानी चुपचाप गुज़र गई
हक़ीक़त की गठरी ढोने में।
किसी वृत्त की भाँति जीवन,
लौट- लौट फिर आता है,
मद्धम – मद्धम जा के समय
प्रवाह में ढल जाता है।
आकिब जावेद