
चल पड़ा हूँ मैं पथिक बन,
ना गंतव्य का मोह, ना मंज़िल का गुमान।
हर कदम पर अनुभव की रेखाएँ हैं,
हर श्वास में छिपा कोई नया विधान॥
ना हार मेरी शत्रु है, ना जीत मेरा मान,
जीवन तो एक दीर्घ यज्ञ है,
मैं उसमें आहुति बनकर पहचान।
धूप में तपकर जो सोना निखरे,
मैं वही ताप माँगता हूँ ईश्वर से।
सुविधाओं के मखमल से नहीं,
साधना के शूलों से संवारता हूँ स्वर से॥
कभी मौन को बोला मैंने,
कभी शब्दों को चुप कराया।
जहाँ लोग भीड़ में खो गए,
मैंने अपने अंतर को ही पाथेय बनाया॥
जो खोया नहीं, वो पाया नहीं,
जो सहा नहीं, वो समझा नहीं।
आचार्य अरुण दैवज्ञ हूँ मैं,
हर अनुभूति को मंत्र बना लिया कहीं॥
कलयुग की भीड़ में ध्यान बनकर जी रहा हूँ,
कर्म की कथा में निर्वाण का बीज बो रहा हूँ।
ना दुख का विलाप, ना सुख का अहंकार,
बस आत्म-तप की लौ में, कर रहा हूँ विस्तार॥
©……✍️
ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र
(आचार्य अरुण दैवज्ञ जी महराज; दार्शनिक, विचारक, कवि ,लेखक, ज्योतिर्विद् तथा परामर्शदाता)
राष्ट्रीय अध्यक्ष: – माँ शारदा वेलफेयर सोसाइटी
सम्पर्क सूत्र: +91-9450276188



