
जीवन के कारवां में
कभी ग़म तो
कभी खुशनुमा है,
यह इक सख्श की नहीं
हर सख्श की जुवां है,
यही आसमां
यही धरा है,
यही बहता जल
अपेक्षा भरा है,
यह मौसम
मौसम की बहारें,
यह ऋतुएं
ऋतुओं के इशारे,
बदल रहा है
बदलता रहेगा,
क्षण क्षण कण कण
समय असमय,
संघर्ष
संघर्ष निरंतर है
जड़ -चेतन का अंतर है,
यही
हर किसी का
कुछ न कुछ कारवां
अवश्य चल रहा है।
कुछ को करे का
फल मिल रहा है
कुछ को नहीं मिल रहा है
पर,
सब को
कुछ न कुछ मिल
अवश्य रहा है ।
संजीव हल्दिवी
बरेली उत्तर प्रदेश



