
कदाचित “काल के कपाल पर लेख नया लिखता हूँ” और “हार नहीं मानूँगा, रार नई ठानूगा” जैसी कालजयी पंक्तियां लिखकर वैश्विक पटल पर अपने कृत्तित्व व व्यक्तित्व की अटल लकीर खींचने वाले महाप्राण कवि हृदय व कुशल राजनेता अटल बिहारी बाजपेयी व दृढ़ संकल्पों को इच्छाशक्ति तथा सच्ची निष्ठा से सफलीभूत करते हुए एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना करने वाले महामना पण्डित मदन मोहन मालवीय विश्व इतिहास में ऐसे स्वनामधन्य महात्मन हैं जिनसे प्रेरणा लेकर हारे हुए लोग भी जीत की और मृत्यु की ओर बढ़ते प्राणी जीवन की संकल्पना कर ही नहीं अपितु उसे साकार भी कर सकते हैं।
बात अगर अटल बिहारी बाजपेयी जी की की जाए तो 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में एक अत्यंत साधारण परिवार में जन्में बाजपेयी जी का सम्पूर्ण जीवनदर्शन अपनेआप में एक खुली किताब औरकि उत्प्रेरणा का अजस्र स्रोत सा है।जिन्होंने प्रारंभिक शिक्षा ग्वालियर से प्राप्त करने के बाद परास्नातक की पढ़ाई कानपुर के ऐतिहासिक दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज से की थी।दिलचस्प बात तो यह है कि वकालत की पढ़ाई इसी कॉलेज से उन्होंने अपने पिता जी के साथ-साथ की थी।जिससे सिद्ध होता है कि उनकी और उनके पिता जी की अध्ययन के प्रति रुचि कितनी तीव्र थी।स्वतंत्र भारत के इतिहास में पण्डित नेहरू के प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल से लेकर जीवनपर्यंत एकमात्र सदन के गवाह और 50 वर्षों से अधिक समय तक बतौर सांसद रहने वाले अटल जी का हर भाषण,हरवक्तव्य और हरकार्य सबसे अलग प्रकार का होता था।यही कारण है कि उनसे समाज का हर तबका व्यक्तिगत लगाव रखता था।कदाचित अटल जी का व्यक्तित्व गंगा जमुनी तहज़ीब को समेटे स्वयम में पवित्र संगम था।जिसमें सभी धर्म,पंथ और जाति वर्ग के लोग सहर्ष आनंदमय डुबकियां लगाते रहते थे।
एक कुशल राजनेता,कुशल वक्ता और कुशल पत्रकार होने के साथ-साथ अटल जी एक जिंदादिल कवि भी थे।उनकी कविताएं राष्ट्रीयता और देशभक्ति की भावनाओं से ओतप्रोत आज भी जस की तस उतनी ही प्रासङ्गिक औरकि सर्वकालिक हैं।
भारतीय जनसंघ के संस्थापक अटल जी भारत के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे।जिनके निर्देशन में 1977 में पहली बार जनसंघ से जनता पार्टी के नाम से अस्तित्व में आई राजनैतिक पार्टी ने देश में पहलीबार सरकार बनाया था और अटल जी पहले गैर कांग्रेसी विदेशमंत्री के तौर पर विश्व पटल पर छा गए।इसके अतिरिक्त कालांतर में लालकृष्ण आडवाणी और इलाहाबाद विश्विद्यालय के प्रोफेसर मुरली मनोहर जोशी के साथ उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना भी की।जिसने नेतृत्व में 1996 में पहलीबार 13 दिन,पुनः 1998-99 में दूसरी बार 13 महीने और फिर 1999-2004 तक कुल तीनबार केंद्र में अटल जी अपनी सरकार बनाने में कामयाब ही नहीं रहे अपितु राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन नामक गैर कांग्रेसी राजनैतिक दलों का समूह भी बनाने में कामयाब रहे,जोकि आज भी केंद्र में सत्तासीन है।
अटल बिहारी बाजपेयी की भाषाशैली उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खाशियत थी।जो भी उनके भाषण को एकबार सुनता वो उन्हीं का बन जाता था।महाकवि दंडी के बाद शब्दों का लालित्य अटल जी की भाषा शैली में ही दिखता है।अंततः जब 2004 के पश्चात उनका स्वास्थ्य गिरने लगा तो स्वयम राजनैतिक सन्यास की घोषणा करते हुए भारतरत्न और पदम् विभूषण से अलंकृत इस महाप्राण माँ भारती के सपूत की इहलीला 16 अगस्त 2018 को समाप्त हो गयी किन्तु अटल जी आज भी भारतीयों के दिलों में जिंदा हैं,अमर हैं।पोखरण द्वितीय का परमाणु परीक्षण,कारगिल विजय,समझौता एक्सप्रेस वे लाहौर बस सेवा,प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना,स्वर्ण चतुर्भुज योजना आदि ऐसी घटनाएं व कार्य हैं जो सदैव बाजपेयी जी का स्मरण दिलाते रहेंगें।
अटल जी की ही तरह भारतीय इतिहास में पण्डित मदनमोहन मालवीय का व्यक्तित्व जहाँ मार्तंड स्वरूप देदीप्यमान है वहीं उनके कृत्तित्व का साक्षात प्रमाण बनारस हिंदू विश्वविद्यालय पूरे विश्व के लिए पथप्रदर्शक है।जहाँ ज्ञान की अजस्र धारा से सम्पूर्ण विश्व सराबोर होकर स्वयम को गौरवांवित महसूस करता है।
महामना की पदवी से विभूषित मदनमोहन मालवीय का जन्म 25 दिसंबर 1861 को इलाहाबाद में हुआ था।कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी ए करने वाले मालवीय जी कांग्रेस के तीन बार अध्यक्ष भी रहे।आज़ादी की लड़ाई में उनके योगदान के अलावा शिक्षाजगत में उनकी यशकीर्ति वैश्विक पटल पर आज भी अनुकरणीय है।एक सामान्य शिक्षक से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उप कुलपति जैसे अति महत्त्वपूर्ण पद पर अपनी सेवाएं देने वाले महामना ने जनसहयोग से इस संस्था को खड़ाकर त्याग और समर्पण का जो उदाहरण प्रस्तुत किया वह बेजोड़ है।भारत स्काउट्स एंड गाइड्स की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मातृभूमि के इस महान सपूत की मृत्यु 12 नबम्बर 1946 को यद्दपि हो गयी थी किन्तु उनका नाम आज भी अमर है।भारत सरकार द्वारा 2015 में अटल जी के साथ मालवीय जी को भी देश का सर्वोच्च सम्मान भारतरत्न प्रदानकर मानो प्रतिभाओं को नमन किया है।
– डॉ.उदयराज मिश्र
शिक्षाविद एवं साहित्यकार
9453433900



