
वह दिसंबर की ठंड और न्यू ईयर का इंतज़ार,
सखियों की टोली और वो यादें बेशुमार।
कहाँ गए वो दिन… कहाँ गए वो पल…
जो बीत गया कल… जो बीत गया कल…
स्कूल की छुट्टी होते ही, हम सब दौड़ लगाते थे,
पॉकेट मनी बचा-बचा कर, ग्रीटिंग्स लेने जाते थे।
वो दो रुपये वाला कार्ड, वो पाँच का उपहार,
दस रुपये में मिल जाता था… खुशियों का संसार!
कहाँ गए वो दिन… कहाँ गए वो पल…
एक-दूसरे के घर जाने का, वो मीठा सा बहाना,
किरण की वो बातें, और मेरा खिलखिलाना।
न्यू ईयर की सुबह, हम सब मंदिर को जाते थे,
हाथ जोड़कर रब से, बस साथ मांग लाते थे।
कहाँ गए वो दिन… कहाँ गए वो पल…
अब न वो कार्ड रहे, न वो सादगी रही,
बस मोबाइल के मैसेज हैं, वो ताज़गी नहीं।
दिल आज भी ढूँढता है, वही मंदिर, वही राह,
काश! फिर मिल जाए… वही बचपन, वही पनाह।
कहाँ गए वो दिन… कहाँ गए वो पल…
ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)



