
“विवाह संपन्न हुआ। आज से आप दोनों एक-दूसरे के जीवनसाथी हुए।”पंडितजी फेरों के मंडप से उठते हुए बोले।
“यह लीजिए पंडित जी आपकी दक्षिणा।” वर के पिता ने पंडितजी को लिफाफा थमाते हुए कहा।
“ग्यारह सौ रुपए? यजमान जी! पूरी रात हम यहां ठंड में विवाह संपन्न करा रहे थे और आप हमें यह केवल ग्यारह सौ रुपए दे रहे हैं?” पंडितजी कुछ अनमने-से थे।
“अरे पंडित जी! आपने किया ही क्या है? कुछ मंत्र और स्वाहा बोलने के अलावा। ग्यारह सौ रुपए पर्याप्त हैं आपकी सेवाओं के लिए।” वर के बहनोई ने ठहाका लगाते हुए कहा।
“जी! आप ठीक कहते हैं। कुछ मंत्र केवल कुछ मंत्र। ढोल वालों को, बैरों को देने, बार काउंटर खुलवाने के लिए, दिखावे में आप लोग हजारों रुपए उड़ा देते हो और सप्तपदी के मंत्रों को उच्चारित करना आपको सेवा लगता है। बिल्कुल ठीक। परन्तु मैं अपनी सेवाओं के लिए मात्र एक रुपया ही लूँगा क्योंकि बिना दक्षिणा कोई भी अनुष्ठान पूर्ण नहीं होता। वर-वधू सदैव खुश रहें। विवाह संपन्न हुआ। सभी अनुष्ठानों की इतिश्री हुई।” कहकर पंडित जी एक रुपए का सिक्का माथे पर लगाकर पंडाल से बाहर चले गए।
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश




