
कीचड़ जो फेंका तुमने मुझे गिराने की चाह में,
मैंने वही कीचड़ सींच दिया अपनी राह के फूलों में।
तुम्हारे कठोर शब्दों से मन कभी डोल न पाया,
मीठे बोलों ने ही मुझको हर बार नया बनाया।
वो मुझ पर पत्थर फेंकते रहे तानों की चोट लिए,
मैं बेटियों को पढ़ाती रही सपनों के दीप लिए।
तुमने जितना रुकावट डाली, उतना आगे बढ़ती गई,
मीठी बातों की पगडंडी से मैं हर दुख से लड़ती गई।
गलतफ़हमियों की आँधी आई, पर मन मेरा डगमगाया नहीं,
कड़वाहट ओढ़कर भी मैंने मधुरता को छोड़ा नहीं।
जिसने तिरस्कार दिया, उसे भी नम्रता से सिर झुका दिया,
मीठे बोलों की ताकत से अपमान को भी मुस्का दिया।
आज वही लोग कहते हैं—“तेरी जीत कुछ अलग सी है,”
क्योंकि मैंने कटुता नहीं, मधुर वाणी को हर पल जिया है।
ज्योती कुमारी
नवादा (बिहार)



